ग्रहण, होलिका दहन और रंगोत्सव : शास्त्र सम्मत निर्णय
(आचार्य राजेश – विभूति फीचर्स) इस वर्ष होली के पर्व पर ग्रहण के कारण श्रद्धालुओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। ऐसे समय में शास्त्रों के अनुसार तिथि, मुहूर्त और नियमों का पालन करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। उपलब्ध पंचांग गणना के आधार पर निम्नलिखित दिशा-निर्देश प्रस्तुत हैं—
होलिका दहन — 2 मार्च
शास्त्रों के अनुसार पूर्णिमा तिथि 2 मार्च को सायंकाल 5:27 बजे (गोधूली बेला से पूर्व) प्रारंभ हो रही है। अतः होलिका पूजन एवं दहन 2 मार्च को ही करना शास्त्रसम्मत एवं शुभ रहेगा। ध्यान देने योग्य है कि 3 मार्च को गोधूली बेला से पूर्व ही पूर्णिमा समाप्त हो रही है। ‘निर्णय सिंधु’ के अनुसार तीन पहर व्यापिनी पूर्णिमा 3 मार्च को उपलब्ध नहीं है, इसलिए दहन का मुख्य विधान 2 मार्च को ही मान्य होगा।
रंगोत्सव एवं अनराय की होली — 3 मार्च
परंपरा के अनुसार जिस दिन होलिका दहन होता है, उसके अगले दिन रंगोत्सव (धुलेंडी) एवं अनराय की होली मनाई जाती है।
3 मार्च को ग्रहण का प्रभाव रहने के कारण समय का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।
ग्रहण, सूतक काल और होली उत्सव
3 मार्च को ग्रहण लगने से सूतक काल के नियम लागू होंगे।
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ठाकुर जी को रंग अर्पण – सूतक काल प्रातः 9:20 बजे से प्रारंभ होगा। अतः इससे पूर्व ही भगवान को अबीर-गुलाल अर्पित कर होली उत्सव का शुभारंभ कर लेना चाहिए।
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होली खेलने का समय – शास्त्रों के अनुसार सूतक काल में रंग खेलने में कोई दोष नहीं लगता।
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शुभ समय – ग्रहण काल में मानसिक शांति एवं सात्विकता बनाए रखना आवश्यक है। अतः दोपहर से पूर्व, विशेषकर सूतक प्रारंभ होने से पहले होली मनाना सर्वश्रेष्ठ और शुभ फलदायी रहेगा

