गरुड़ पुराण: मृत्यु के अंतिम क्षणों में क्यों डाला जाता है मुंह में गंगाजल और तुलसी? जानें धार्मिक
सनातन संस्कृति डेस्क: सनातन धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कारों का विधान है। इनमें 'अंतिम समय' (अंत्येष्टि से ठीक पहले) की परंपराएं बेहद महत्वपूर्ण मानी गई हैं। आपने अक्सर देखा या सुना होगा कि जब किसी व्यक्ति के प्राण निकलने वाले होते हैं, तो उसके मुंह में गंगाजल की कुछ बूंदें और तुलसी दल (पत्ता) रखा जाता है।
गरुड़ पुराण में इस प्रथा का विशेष महत्व बताया गया है। सुप्रसिद्ध ज्योतिषी डॉ. बसवराज गुरुजी के अनुसार, इस प्राचीन परंपरा के पीछे गहरे धार्मिक, आध्यात्मिक और कुछ वैज्ञानिक कारण छिपे हैं, जो जीवात्मा की आगे की यात्रा को सुगम बनाते हैं। आइए जानते हैं इसके पीछे के मुख्य रहस्य:
1. जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मनुष्य अपने जीवनकाल में जो भी पाप या पुण्य कर्म करता है, वे अंतिम समय में उसकी आत्मा को आसानी से शरीर छोड़ने नहीं देते। इस दौरान व्यक्ति को असहनीय पीड़ा (कष्ट) का सामना करना पड़ता है।
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पापों का नाश: गरुड़ पुराण के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति भोजन-पानी का त्याग कर अंतिम सांसें ले रहा होता है, तब उसके मुंह में तीन बार गंगाजल और तुलसी अर्पित करने से उसके संचित पाप और कर्मों का बंधन शिथिल हो जाता है।
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वैकुंठ की प्राप्ति: तुलसी को 'हरिप्रिया' या 'विष्णुप्रिया' कहा जाता है। मृत्यु के समय इसे धारण करने से व्यक्ति को साक्षात भगवान विष्णु की कृपा मिलती है और आत्मा जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष (वैकुंठ धाम) को प्राप्त करती है।
2. यमदूतों का भय होता है दूर
आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के अंतिम क्षणों में जब पापी या साधारण जीवात्मा के सामने यमदूत प्रकट होते हैं, तो वह अत्यंत भयभीत हो जाती है।
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सुरक्षा कवच: डॉ. बसवराज गुरुजी बताते हैं कि तुलसी दल को यमदूतों के लिए भय का स्रोत माना गया है। जिस शरीर या मुख में तुलसी विराजमान होती है, यमदूत उसे बलपूर्वक स्पर्श नहीं कर पाते।
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सुगम यात्रा: तुलसी और गंगाजल के प्रभाव से यमदूतों का भय दूर होता है और पवित्र हुई आत्मा बिना किसी कष्ट के अपनी अगली लौकिक यात्रा को सुगमतापूर्वक पूरा करती है।
3. शरीर का शुद्धिकरण और दिव्यता
गंगा नदी को साक्षात देव नदी माना गया है, जो शिव की जटाओं से निकलकर धरती को पवित्र करती हैं। मृत्यु के समय जब गंगाजल शरीर के भीतर प्रवेश करता है, तो वह कंठ और आंतरिक अंगों को पवित्र कर देता है। इससे मृतप्राय शरीर को भी एक प्रकार की दिव्यता और पवित्रता प्राप्त होती है, जिससे वह पंचतत्वों में विलीन होने के लिए तैयार हो जाता है।
क्या है इसके पीछे का वैज्ञानिक दृष्टिकोण?
यदि इसे वैज्ञानिक और आयुर्वेद के नजरिए से देखा जाए, तो इसके अपने अलग लाभ हैं:
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श्वसन क्रिया में राहत: मृत्यु के अंतिम समय में व्यक्ति का रेस्पिरेटरी सिस्टम (श्वसन तंत्र) धीमा पड़ने लगता है और कफ बढ़ने से सांस लेने में भारी तकलीफ होती है।
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तुलसी के औषधीय गुण: तुलसी एक बेहतरीन एंटी-बायोटिक और प्राणवायु (ऑक्सीजन) को संतुलित करने वाला पौधा है। इसके रस और गंगाजल के मिश्रण से गले में फंसा कफ साफ होता है और दम तोड़ रहे व्यक्ति को कुछ हद तक सांस की तकलीफ से तात्कालिक राहत मिलती है।
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ज्योतिष शास्त्र और आयुर्वेद में माना गया है कि केवल मृत्यु के समय ही नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में भी यदि प्रतिदिन तुलसी के एक पत्ते का सेवन किया जाए, तो यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और जीवन के अनेक दोषों को दूर करता है।
