सदैव मंगलकारी प्रभु श्रीराम के परमभक्त पवनपुत्र हनुमान
लेखक: अंजनी सक्सेना (विभूति फीचर्स)
भारतीय अध्यात्म और भक्ति परंपरा में बजरंगबली हनुमान एक ऐसे देव हैं, जो न केवल संकटमोचक हैं, बल्कि शक्ति, बुद्धि और भक्ति के अद्भुत संगम भी हैं। वे प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त हैं और रामकाज के लिए हर पल तत्पर रहने वाले 'चिरंजीवी' देव माने जाते हैं।
1. पराक्रम ऐसा कि काल भी विस्मित हो जाए
श्री हनुमान जी का बल और पराक्रम अतुलनीय है। रामायण के अनुसार, जब हनुमान जी ने लंका दहन किया, तब स्वयं लंकापति रावण उनके रौद्र रूप को देखकर चकित रह गया था। रावण के मन में यह वितर्क होने लगा था कि क्या यह देवराज इंद्र हैं, या साक्षात यम, वरुण, पवन या सूर्य हैं? अंततः उसने स्वीकार किया कि यह कोई साधारण वानर नहीं, बल्कि साक्षात 'काल' का स्वरूप है।
2. अमरता और अमिट कीर्ति का वरदान
हनुमान जी की भक्ति का स्तर यह है कि उन्होंने स्वयं भगवान श्रीराम से केवल कथा श्रवण के लिए चिरंजीवी होने का वरदान मांगा था। उन्होंने कहा था:
यावद रामकथा वीर चरिष्यति मही तले। तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राण मम न, संशय।।
अर्थात्, "हे रघुनंदन! जब तक इस पृथ्वी पर आपकी दिव्य कथा प्रचलित रहेगी, तब तक मेरे प्राण इस शरीर में निवास करें।" भगवान राम ने भी उन्हें हृदय से आशीर्वाद देते हुए कहा था कि जब तक संसार में राम कथा रहेगी, तब तक हनुमान जी की कीर्ति अमिट रहेगी और वे सशरीर जीवित रहेंगे।
3. समुद्र लंघन: बल और धैर्य का परिचय
जब सीता माता की खोज में समुद्र को लांघने की चुनौती आई, तब जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी सोई हुई शक्तियों का स्मरण कराया। जामवंत जी ने उन्हें वानर जगत का गौरव और बल में श्रीराम-लक्ष्मण के तुल्य बताया। हनुमान जी का विशालकाय रूप, स्वर्ण वर्ण मुख और सुदीर्घ भुजाएं देखकर समस्त प्राणी चकित रह गए थे। रामायण रूपी महामाला में उन्हें एक 'अनुपम रत्न' के रूप में अंकित किया गया है।
4. हनुमान जी के पांच भाई: एक रोचक लोककथा
सामान्यतः हम हनुमान जी को अंजनी पुत्र के रूप में जानते हैं, लेकिन कुछ लोककथाओं और ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि हनुमान जी छह भाई थे। इनमें हनुमान जी सबसे बड़े और अविवाहित ब्रह्मचारी थे, जबकि उनके अन्य पांच भाइयों का विवाह हुआ था और वे पुत्र-पौत्रों से संपन्न थे। उनके नाम इस प्रकार हैं:
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केसरीनन्दन हनुमान
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मतिमान
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श्रुतिमान
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केतुमान
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गतिमान
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धृतिमान
5. ग्यारहवें रुद्र के रूप में अवतार
महाकवि गिरधर कृत 'गुजराती रामायण' में एक विशेष प्रसंग मिलता है। इसके अनुसार, माता अंजनी की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव (रुद्र) ने उन्हें वरदान दिया था कि उनके गर्भ से स्वयं ग्यारहवें रुद्र प्रकट होंगे। कालांतर में यही ग्यारहवें रुद्र 'हनुमान' के नाम से विश्वविख्यात हुए। हनुमान जी का जीवन हमें सिखाता है कि शक्ति का सदुपयोग और सेवा का भाव ही मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाता है। वे आज भी भक्तों के कष्टों को दूर करने के लिए इस पृथ्वी पर साक्षात विद्यमान माने जाते हैं।
