हरतालिका तीज : आस्था, अखण्ड सुहाग और समर्पण का पर्व

Hartalika Teej: A festival of faith, unbroken marital bliss and dedication
 
हरतालिका तीज का महत्व  यह व्रत अविवाहित युवतियों द्वारा मनोनुकूल पति की प्राप्ति और सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा अखण्ड सुहाग की कामना के लिए किया जाता है। शास्त्रों में देवी गौरी (पार्वती) को षोडश मातृकाओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है और इसी स्वरूप की पूजा इस दिन की जाती है।  पौराणिक कथा  किंवदंती है कि सती रूप में देह त्यागने के बाद पार्वती जी का जन्म राजा हिमाचल के घर हुआ। बचपन से ही वे भगवान शिव की आराधना में लीन रहती थीं। जब नारद मुनि ने हिमाचल को बताया कि उनकी कन्या का विवाह भगवान विष्णु से होना चाहिए, तो हिमाचल सहमत हो गए। लेकिन पार्वती जी इस प्रस्ताव से व्यथित हुईं। उनकी सहेलियां जया और विजया उन्हें महल से दूर एक गुफा में ले गईं, जहां पार्वती ने बालू से शिवलिंग बनाकर तपस्या शुरू की। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को उन्होंने निर्जल और निराहार रहकर रात्रि जागरण सहित शिव आराधना की। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और पार्वती जी को पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया। यही कारण है कि यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है।  व्रत विधि  व्रत का आरंभ प्रातःकाल से किया जाता है।  महिलाएं दिनभर निराहार व निर्जल रहती हैं।  गोधूलि बेला में मिट्टी या बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है।  पार्वती जी को लाल वस्त्र और भगवान शिव को पीला उत्तरीय पहनाया जाता है।  व्रतधारी स्त्रियां सोलह श्रृंगार करके पूजा करती हैं।  पूजा में बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, तुलसीपत्र, फल-फूल और सुहाग सामग्री (चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, कंगन, बिछिया आदि) अर्पित किए जाते हैं।  रात्रि भर भजन-कीर्तन और शिव-पार्वती की स्तुति की जाती है।  अगले दिन सूर्योदय से पहले प्रतिमाओं का जलाशय में विसर्जन और ब्राह्मण को दान देकर व्रत का पारण होता है।  नामकरण का कारण  कथा के अनुसार पार्वती जी को उनकी सहेलियों ने विवाह से बचाने के लिए "हर" लिया था, इसलिए इसे हरतालिका व्रत कहा जाता है।  भारतीय संस्कृति का संदेश  हरतालिका तीज यह दर्शाती है कि भारतीय महिलाएं अपनी आस्था, विश्वास और संकल्प के प्रति कितनी दृढ़ होती हैं। गणगौर, वट सावित्री, करवाचौथ और हरतालिका जैसे व्रत नारी की भक्ति, समर्पण और सनातन संस्कृति की विशेषता को जीवंत बनाए रखते हैं।

(अंजनी सक्सेना – विभूति फीचर्स)

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला हरतालिका तीज भारतीय नारी की आस्था, अखण्ड सुहाग और संकल्प का अद्भुत प्रतीक है। वर्षा ऋतु के बीच जब आसमान मेघों से गरजता-बरसता है, धरती हरियाली से आच्छादित होती है और वातावरण पुष्पों की सुगंध से महक उठता है, तभी यह पावन पर्व आता है।

हरतालिका तीज का महत्व

यह व्रत अविवाहित युवतियों द्वारा मनोनुकूल पति की प्राप्ति और सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा अखण्ड सुहाग की कामना के लिए किया जाता है। शास्त्रों में देवी गौरी (पार्वती) को षोडश मातृकाओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है और इसी स्वरूप की पूजा इस दिन की जाती है।

पौराणिक कथा

किंवदंती है कि सती रूप में देह त्यागने के बाद पार्वती जी का जन्म राजा हिमाचल के घर हुआ। बचपन से ही वे भगवान शिव की आराधना में लीन रहती थीं। जब नारद मुनि ने हिमाचल को बताया कि उनकी कन्या का विवाह भगवान विष्णु से होना चाहिए, तो हिमाचल सहमत हो गए। लेकिन पार्वती जी इस प्रस्ताव से व्यथित हुईं।
उनकी सहेलियां जया और विजया उन्हें महल से दूर एक गुफा में ले गईं, जहां पार्वती ने बालू से शिवलिंग बनाकर तपस्या शुरू की। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को उन्होंने निर्जल और निराहार रहकर रात्रि जागरण सहित शिव आराधना की। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और पार्वती जी को पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया। यही कारण है कि यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है।

व्रत विधि

  • व्रत का आरंभ प्रातःकाल से किया जाता है।

  • महिलाएं दिनभर निराहार व निर्जल रहती हैं।

  • गोधूलि बेला में मिट्टी या बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है।

  • पार्वती जी को लाल वस्त्र और भगवान शिव को पीला उत्तरीय पहनाया जाता है।

  • व्रतधारी स्त्रियां सोलह श्रृंगार करके पूजा करती हैं।

  • पूजा में बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, तुलसीपत्र, फल-फूल और सुहाग सामग्री (चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, कंगन, बिछिया आदि) अर्पित किए जाते हैं।

  • रात्रि भर भजन-कीर्तन और शिव-पार्वती की स्तुति की जाती है।

  • अगले दिन सूर्योदय से पहले प्रतिमाओं का जलाशय में विसर्जन और ब्राह्मण को दान देकर व्रत का पारण होता है।

नामकरण का कारण

कथा के अनुसार पार्वती जी को उनकी सहेलियों ने विवाह से बचाने के लिए "हर" लिया था, इसलिए इसे हरतालिका व्रत कहा जाता है।

भारतीय संस्कृति का संदेश

हरतालिका तीज यह दर्शाती है कि भारतीय महिलाएं अपनी आस्था, विश्वास और संकल्प के प्रति कितनी दृढ़ होती हैं। गणगौर, वट सावित्री, करवाचौथ और हरतालिका जैसे व्रत नारी की भक्ति, समर्पण और सनातन संस्कृति की विशेषता को जीवंत बनाए रखते हैं।

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