होलिका दहन 2026: क्यों जलाई जाती हैं गेहूं की बालियां? जानें नवान्न परंपरा का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व
होलिका दहन शुभ मुहूर्त और ग्रहण का साया
साल 2026 में होलिका दहन 3 मार्च, मंगलवार को होगा। इस दिन चंद्र ग्रहण की स्थिति के कारण सूतक काल का ध्यान रखना अनिवार्य है:
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पूर्णिमा तिथि: 2 मार्च (शाम 05:55) से 3 मार्च (शाम 05:07) तक।
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चंद्र ग्रहण का समय: 3 मार्च (दोपहर 03:20 से शाम 06:47 तक)।
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दहन का शुभ मुहूर्त: ग्रहण और सूतक काल की समाप्ति के बाद, शाम 06:22 से रात 08:50 के बीच पूजा और दहन करना फलदायी रहेगा।
क्यों अर्पित की जाती हैं नई फसलें? (धार्मिक महत्व)
1. नवान्नेष्टि यज्ञ की परंपरा प्राचीन काल से ही होलिका दहन को 'नवान्नेष्टि यज्ञ' माना गया है। इस समय रबी की फसल (गेहूं, जौ, चना) पककर तैयार होती है। किसान अपनी पहली उपज का हिस्सा अग्नि देव को समर्पित कर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। मान्यता है कि इससे घर में मां अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है और अनाज की कभी कमी नहीं होती।
2. सात बालियों का महत्व कई क्षेत्रों में अग्नि में सात बालियां डालने का विधान है। अंक सात को उन्नति और आरोग्य का प्रतीक माना जाता है। अग्नि में भुनी इन बालियों को 'होरहा' या 'होला' कहा जाता है, जिसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से नकारात्मकता दूर होती है।
परंपरा के पीछे का विज्ञान (स्वास्थ्य लाभ)
1. ऋतु परिवर्तन और आहार फाल्गुन के अंत के साथ ही वसंत ऋतु विदा लेती है और ग्रीष्म ऋतु (गर्मी) का आगमन होता है। मौसम के इस बदलाव के दौरान शरीर की जठराग्नि मंद हो जाती है। अग्नि में भुना हुआ अनाज (चना और गेहूं) सुपाच्य, हल्का और ऊर्जा से भरपूर होता है, जो बदलते मौसम में शरीर को बीमारियों से लड़ने की शक्ति देता है।
2. शरीर को ऊर्जा और डिटॉक्सिफिकेशन भुना हुआ चना और जौ फाइबर से भरपूर होते हैं। इन्हें प्रसाद के रूप में खाने से शरीर को तुरंत ऊर्जा मिलती है और यह पाचन तंत्र को संतुलित रखने में मदद करता है।
