जब लंका में यमराज ने हनुमान जी को मारी लात

When Yamraj Kicked Hanuman in Lanka
 
जब लंका में यमराज ने हनुमान जी को मारी लात
रामायण के कई प्रसंगों में हनुमान जी की शक्ति और बुद्धि के दर्शन होते हैं, लेकिन लंका दहन से पहले का एक प्रसंग अत्यंत रोचक है। यह कथा बताती है कि कैसे रावण ने अपनी शक्तियों के अहंकार में मृत्यु के देवता यमराज तक को बंदी बना लिया था और कैसे हनुमान जी ने उनकी दासता को समाप्त किया।

लंका प्रवेश और यमराज का प्रहार

पौराणिक कथा के अनुसार, जब हनुमान जी सीता माता की खोज में समुद्र लांघकर लंका पहुँचे, तो अचानक उनकी पीठ पर किसी ने जोर से प्रहार (लात) किया। इतनी लंबी यात्रा की थकान के बाद ऐसा स्वागत पाकर हनुमान जी क्रोधित हो गए। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो सामने स्वयं यमराज खड़े थे।

हनुमान जी ने आश्चर्य और रोष के साथ कहा, "अतिथि का स्वागत इस तरह करना आपको शोभा नहीं देता। क्या आपको शिष्टाचार नहीं सिखाया गया?"

यमराज की विवशता और रावण का 'रुद्र मंत्र'

हनुमान जी को पहचानते ही यमराज लज्जित और व्यथित हो गए। उन्होंने अपनी विवशता बताते हुए कहा, "हे पवनपुत्र! मुझे क्षमा करें। रावण ने मुझे 'रुद्र मंत्र' की शक्ति से बांध रखा है और आदेश दिया है कि जो भी बिना अनुमति लंका में प्रवेश करे, उसे दंड दूँ। मैं काल हूँ, किंतु रावण के तंत्र ने मुझे परतंत्र कर दिया है।"

यमराज ने आगे बढ़कर थोड़ा अहंकार में कहा, "यह रुद्र मंत्र साक्षात शिव का आशीर्वाद है। शिव महाकाल हैं और मैं काल, उनके बाद मेरा ही स्थान है। इस बंधन को तोड़ना किसी के बस की बात नहीं है।"

हनुमान जी का महाकाल अवतार और यमराज का विस्मय

यमराज के अहंकार और रुद्र मंत्र की बात सुनकर हनुमान जी मंद-मंद मुस्कुराए। वे स्वयं भगवान शिव के 11वें रुद्र अवतार हैं। हनुमान जी ने पलक झपकते ही यमराज के हाथों में पड़ी उस 'रुद्र मंत्र' की हथकड़ी पर एक जोरदार प्रहार किया।

देखते ही देखते, वह शक्तिशाली बंधन मिट्टी के खिलौने की तरह टूटकर बिखर गया। यमराज यह देखकर अवाक रह गए। उन्हें अहसास हुआ कि जिस 'महाकाल' के मंत्र से वे बंधे थे, वह महाकाल स्वयं हनुमान के रूप में उनके सम्मुख खड़ा है। यमराज की बोलती बंद हो गई और वे केवल श्रद्धा के साथ उन्हें निहारते रह गए।

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