दीप पर्व पर लक्ष्मी पूजन: धन नहीं, समृद्धि और संस्कार का उत्सव
आचार्य राजेश | विभूति फीचर्स
दीपावली केवल दीप जलाने का त्योहार नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश, अभाव से पूर्णता और अशुभ से शुभ की ओर बढ़ने का पर्व है। इस उत्सव के केंद्र में लक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व है। शास्त्रों में मां लक्ष्मी को केवल धन की देवी नहीं, बल्कि ‘श्री’ अर्थात शोभा, समृद्धि, आरोग्य, सद्बुद्धि और सद्गुणों की अधिष्ठात्री माना गया है। इसलिए दीपावली पर लक्ष्मी का आह्वान केवल धन-संपत्ति की कामना नहीं, बल्कि घर-परिवार में पवित्रता, सुख और सकारात्मकता का आमंत्रण भी है।
आज की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में कई बार पूजा जल्दबाजी में संपन्न होती है। सामग्री छूट जाती है और विधि भी अधूरी रह जाती है। यदि पहले से थोड़ी तैयारी कर ली जाए, तो पूजन अधिक व्यवस्थित होने के साथ पूरे परिवार के लिए आध्यात्मिक अनुभव बन सकता है।
पहले तैयारी, फिर पूजन
मां लक्ष्मी को स्वच्छता प्रिय मानी गई है। इसलिए पूजन से पहले घर की सफाई, पूजा स्थल की तैयारी और मन की शुद्धता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
पूजन सामग्री को दो भागों में तैयार करें।
1. मुख्य पूजन सामग्री: गणेश-लक्ष्मी का पाना या प्रतिमा, पूजा की चौकी, लाल या पीला वस्त्र, दो कलश (तांबे या कांसे के; इनके अभाव में स्टील के कलश पर हल्दी का लेप किया जा सकता है), एक साबुत गोल सुपारी (गणेश जी के प्रतीक के रूप में), एक लंबी सुपारी (कलश के लिए), नारियल, हल्दी की गांठ, चांदी या प्रचलित एक और पांच रुपये के दो सिक्के, पान के दो पत्ते तथा आम या अशोक के पांच पत्ते।
2. पूजा थाली और सजावट की सामग्री: रोली, कुंकुम, अक्षत, मेहंदी, पिसी हल्दी, मौली, चंदन, अष्टगंध, केसर, इत्र, कपूर, धूप, पंचामृत, खील-बताशे, फल-मिठाई, गुड़, साबुत धनिया, लाल-पीले-सफेद फूल, एक अखंड दीप, आरती के लिए पांच या 11 घी के दीये और घर को रोशन करने के लिए 15 या 23 मिट्टी के दीये।
चौकी सजाने की विधि: यही है श्री का आसन
पूजन के समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना शुभ माना जाता है। सबसे पहले दीवार पर लक्ष्मी पाना लगाएं। उसके नीचे रखी चौकी पर अष्टगंध से अष्टदल कमल बनाएं। इसे देवी का आसन माना जाता है। कमल पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और ठीक बीच में एक सिक्का तथा हल्दी की गांठ रखें। इसे चल कोष का प्रतीक माना जाता है। मान्यता के अनुसार इसे साल भर तिजोरी में सुरक्षित रखा जाता है और खर्च नहीं किया जाता।
अब सिक्के के पीछे गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें। ध्यान रखें कि लक्ष्मी जी गणेश जी के दाईं ओर रहें। सिक्के के दाईं ओर गोल सुपारी रखें। अक्षत पर अखंड दीप स्थापित करें और उसमें तिल या मूंगफली का तेल डालें। यह दीप पूरी रात जलने वाला साक्षी दीप माना जाता है।
चौकी के बाईं ओर कलश स्थापित करें। उसमें जल, लंबी सुपारी और एक सिक्का डालें। कलश में आम के पत्ते लगाकर ऊपर नारियल रखें, जिसका मुख आपकी ओर हो। कलश पर मौली बांधें और स्वस्तिक बनाएं।
शंख-घंटी के साथ करें पूजन का आरंभ
शंख और घंटी बजाकर ‘ॐ श्रीं श्रियै नमः’ मंत्र के साथ पूजन शुरू करें। परिवार के सभी सदस्य यह भाव रखें कि वे केवल धन नहीं, बल्कि सुख, आरोग्य और सद्गुणों की कामना कर रहे हैं।
सबसे पहले अखंड दीप और कलश का पूजन कर पुष्प अर्पित करें। इसके बाद निम्न मंत्र के साथ मां से प्रार्थना करें—
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि!
विवादे विषादे प्रवासे प्रमादे,
जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि,
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि!
मंत्र का अर्थ: हे भवानी! विवाद, विषाद, प्रवास, जल, अग्नि, पर्वत, शत्रुओं के बीच और वन में भी आप ही मेरी एकमात्र गति हैं। आप सदैव मेरी रक्षा करें।
इसके बाद आचमनी से जल लेकर आत्मशुद्धि और पूजन सामग्री की शुद्धि करें। लक्ष्मी पाना को कुछ देर एकटक निहारते हुए मन में देवी के साक्षात विराजमान होने का भाव रखें। पंचामृत से स्नान कराएं। मौली को वस्त्र और हल्दी लगे चावलों को आभूषण के रूप में अर्पित करें।
गणेश जी को पीले, लक्ष्मी जी को लाल और सरस्वती जी को सफेद पुष्प प्रिय माने गए हैं। अष्टगंध देवी के चारों हाथों पर लगाएं। धूप की सुगंध और घी के दीपक की आभा देवी की ओर अर्पित करें। इसके बाद नैवेद्य, खील-बताशे और पान का बीड़ा चढ़ाएं।
अंत में हाथ में सिक्का और पुष्प लेकर ‘ॐ ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः’ मंत्र का 11 या 21 बार जाप करें। इसके बाद यह सिक्का गृहलक्ष्मी के आंचल में डालें।
दीयों का महत्व: अपना घर रोशन करें, दूसरों के जीवन में भी उजाला बांटें
आरती के 11 दीयों में से एक मंदिर में, एक रसोई में (अन्नपूर्णा के लिए), एक तुलसी चौरे पर, एक बैठक में, दो मुख्य द्वार पर और चार घर के चारों कोनों में रखें। शेष एक दीया किसी पड़ोसी या परिचित के घर दान करें। दीपावली का संदेश भी यही है कि हमारा घर रोशन हो और दूसरों के जीवन में भी उजाला पहुंचे।
यदि पांच दीये हैं, तो एक मंदिर में, एक रसोई में, एक तुलसी के पास और दो मुख्य द्वार पर रखें। इसके अलावा 15 से 23 मिट्टी के दीये बालकनी, मुंडेर और आंगन में सजाएं। अंत में आरती करें और पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें।
याद रखिए, लक्ष्मी चंचल नहीं, हमारा मन चंचल है। जहां स्वच्छता, तैयारी, श्रद्धा और पूरे परिवार का एक साथ बैठकर किया गया भावपूर्ण पूजन होता है, वहां समृद्धि के साथ संस्कार और सकारात्मकता का वातावरण भी बनता है। दीपावली का वास्तविक संदेश भी यही है—धन के साथ सद्बुद्धि, सुख और सद्भाव का प्रकाश घर-घर पहुंचे।
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