भगवान शिव की विराट दिव्यता का महापर्व : महाशिवरात्रि

The great festival of the great divinity of Lord Shiva – Mahashivratri
 
The great festival of the great divinity of Lord Shiva – Mahashivratri

(अंजनी सक्सेना | विभूति फीचर्स)  देवों के देव भगवान शिव के भक्तों के लिए महाशिवरात्रि का व्रत अत्यंत विशेष महत्व रखता है। यह पावन पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत, पूजा और उपासना करने से भगवान भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उपासक की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। महाशिवरात्रि का व्रत स्त्री-पुरुष, युवा-वृद्ध सभी कर सकते हैं। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन भगवान शिव का अंश प्रत्येक शिवलिंग में दिन-रात विद्यमान रहता है। इसी कारण इस दिन की गई शिव-आराधना शीघ्र फलदायी मानी गई है।

महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व

वर्ष की अनेक रात्रियों में महाशिवरात्रि का स्थान सर्वोपरि है। शास्त्रों के अनुसार इस रात्रि में उपवास रखकर शिव-पूजन, शिव-कथा, स्तोत्र-पाठ तथा ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करते हुए रात्रि-जागरण करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। व्रत के अगले दिन ब्राह्मणों को यथाशक्ति भोजन, वस्त्र एवं दक्षिणा देकर संतुष्ट किया जाता है।

चार प्रहर की पूजा विधि

महाशिवरात्रि के दिन फल, पुष्प, चंदन, बिल्वपत्र, धतूरा, धूप-दीप और नैवेद्य से चारों प्रहर शिव-पूजन करना चाहिए। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत बनाकर शिवलिंग का अभिषेक करें, तत्पश्चात जलाभिषेक करें। प्रत्येक प्रहर में शिव-पंचाक्षर मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप विशेष फलदायी माना गया है। भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान, भीम और ईशान—इन आठ नामों से पुष्प अर्पित कर भगवान शिव की आरती और परिक्रमा करनी चाहिए।

शिव-पार्वती विवाह और पौराणिक मान्यताएँ

शास्त्रों में वर्णन है कि महाशिवरात्रि की रात्रि माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह सम्पन्न हुआ था, इसलिए यह शिवरात्रि सभी मासिक शिवरात्रियों में श्रेष्ठ मानी जाती है। एक अन्य मान्यता के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान शिव का रौद्र रूप में अवतरण हुआ था।

समुद्र मंथन की कथा भी महाशिवरात्रि से जुड़ी है। इसी दिन निकले कालकूट विष को भगवान शिव ने संपूर्ण सृष्टि की रक्षा के लिए स्वयं ग्रहण किया, जिससे उनका कंठ नीला हो गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए।

स्त्रियों और कन्याओं के लिए विशेष महत्व

महाशिवरात्रि का पर्व महिलाओं के लिए विशेष फलदायी माना गया है। कुंवारी कन्याएँ मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए तथा विवाहित महिलाएँ अखंड सौभाग्य और पारिवारिक सुख-शांति के लिए शिव-पार्वती की आराधना करती हैं।

ज्योतिषीय और तांत्रिक दृष्टि से महत्व

चतुर्दशी तिथि के स्वामी स्वयं भगवान शिव हैं। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्रि में चंद्रमा की क्षीण अवस्था मन पर तामसिक प्रभाव बढ़ाती है। ऐसे में शिव-आराधना मानसिक बल प्रदान कर नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करती है। यही कारण है कि शिवरात्रि को ‘अहोरात्रि’ भी कहा गया है।

शिव-शक्ति की संयुक्त आराधना

महाशिवरात्रि पर शिव के साथ शक्ति की उपासना करना विशेष पुण्यदायी माना गया है। शिव और शक्ति का योग ही सृष्टि की समस्त ऊर्जा का मूल है। यह पर्व आसुरी शक्तियों पर विजय और आत्मिक शुद्धि का प्रतीक है। महाशिवरात्रि केवल एक व्रत या पर्व नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साधना और शिव-तत्व की अनुभूति का महापर्व है। इस दिन श्रद्धा और भक्ति से की गई पूजा जीवन में शांति, समृद्धि, स्वास्थ्य और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।

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