सूर्यदेव की आराधना का पर्व है मकर संक्रांति
(अंजनी सक्सेना — विभूति फीचर्स)
भारत में सूर्य आदिकाल से ही जन-आस्था, श्रद्धा, आराधना और उपासना के केंद्र रहे हैं। वैदिक काल में सूर्य की पूजा अपने चरमोत्कर्ष पर थी। देश के विभिन्न भागों में स्थित भव्य सूर्य मंदिर इस तथ्य के साक्ष्य हैं कि हर युग में भारत में सूर्योपासना की परंपरा जीवंत रही है।
जब खगोलशास्त्रियों ने सूर्य की गति का वैज्ञानिक अध्ययन किया, तब सूर्य उपासना की एक नई पद्धति सामने आई। सूर्य जब आकाशमंडल में एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो उसे संक्रांति कहा जाता है। इस प्रकार वर्ष में बारह संक्रांतियाँ होती हैं, किंतु इनमें सबसे महत्वपूर्ण मकर संक्रांति मानी जाती है। इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है।
चूँकि सूर्य लगभग 365 दिनों में बारह राशियों का भ्रमण पूर्ण करता है, इसलिए मकर संक्रांति सामान्यतः 14 जनवरी को आती है, जबकि कुछ वर्षों में यह 15 जनवरी को भी पड़ती है। भारतीय मान्यता के अनुसार इस दिन का एक विशेष आध्यात्मिक महत्व भी है—इसी दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करता है।
उत्तरायण का विशेष महत्व
भारत में उत्तरायण सूर्य का अत्यंत शुभ महत्व है। शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त प्रायः तभी निकाला जाता है जब सूर्य उत्तरायण में होता है। उत्तरायण काल में सूर्य का झुकाव उत्तर दिशा की ओर होता है। इसका प्रमाण हमें महाभारत में भी मिलता है—भीष्म पितामह ने दक्षिणायन काल में देह त्याग नहीं किया, बल्कि उत्तरायण सूर्य की प्रतीक्षा की, ताकि उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हो सके।
देशभर में विविध परंपराएँ
मकर संक्रांति भारत के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है, किंतु सभी का मूल उद्देश्य एक ही है—सूर्य की उपासना और कृतज्ञता। इस दिन पवित्र नदियों, सरोवरों और कुंडों में स्नान, दान तथा सूर्य को अर्घ्य देने का विशेष धार्मिक महत्व है।
इसी कारण मकर संक्रांति पर तीर्थस्थलों में हजारों श्रद्धालु स्नान-दान करते हैं। शीत ऋतु के कारण इस दिन तिल और गुड़ के सेवन तथा दान को विशेष रूप से पुण्यदायी माना जाता है। तिल पीसकर उबटन बनाया जाता है, उसे शरीर पर लगाकर स्नान किया जाता है तथा तिल-गुड़ से बनी वस्तुओं का दान किया जाता है।
उत्तर भारत में इस दिन खिचड़ी और तिल खाने और दान करने की परंपरा है। बंगाल और ओडिशा में भी यही प्रथा प्रचलित है। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में सौभाग्यवती स्त्रियाँ एक-दूसरे को वस्त्र और वस्तुएँ भेंट करती हैं। महाराष्ट्र में यह परंपरा हल्दी-कुमकुम के नाम से जानी जाती है, जहाँ सौभाग्यवती महिलाओं को हल्दी और कुमकुम का तिलक लगाया जाता है।
पंजाब में मकर संक्रांति को लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है और इस अवसर पर अग्नि प्रज्वलित की जाती है। कई स्थानों पर बच्चे और युवा पतंग उड़ाते हैं। कुछ क्षेत्रों में ब्राह्मण इस दिन यज्ञोपवीत परिवर्तन करते हैं और उन्हें अन्न व खाद्य पदार्थों से भरे पात्र दान में दिए जाते हैं।
स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण
मकर संक्रांति का पर्व स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी माना गया है। तिल और गुड़ के सेवन से शीतजनित रोगों से रक्षा होती है, जबकि तिल के उबटन से त्वचा की कांति बढ़ती है और शरीर को ऊर्जा मिलती है। भारतीय धर्मग्रंथों में मकर संक्रांति के महत्व का विस्तृत वर्णन मिलता है। स्नान और दान को इस दिन विशेष फलदायी बताया गया है। एक धार्मिक मान्यता के अनुसार सूर्योपासना और मकर संक्रांति व्रत के पुण्य फलस्वरूप ही यशोदा को भगवान कृष्ण की प्राप्ति हुई थी।
