हे कृष्ण, तुम फिर आ जाओ...
(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)
कभी-कभी लगता है कि समय कितना भी बदल जाए, मनुष्य की कुछ बेचैनियां हमेशा एक जैसी रहती हैं। द्वापर युग में भी समाज अन्याय, अत्याचार, अहंकार और अधर्म से जूझ रहा था और आज भी परिस्थितियां पूरी तरह अलग नहीं हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि तब अत्याचार का चेहरा सामने दिखाई देता था, जबकि आज वह कई बार व्यवस्था, स्वार्थ, छल, लालच और संवेदनहीनता के पीछे छिपा रहता है। शायद यही कारण है कि जन्माष्टमी आते ही मन अनायास पुकार उठता है—हे कृष्ण, तुम फिर आ जाओ...
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म उस दौर में हुआ, जब मथुरा का राजसिंहासन कंस के अत्याचार का प्रतीक बन चुका था। प्रजा भयभीत थी, सत्ता निरंकुश थी और सच बोलना आसान नहीं था। कृष्ण का जन्म किसी राजमहल की सुविधा में नहीं, बल्कि कारागार में हुआ। आधी रात को जन्मे उस बालक ने आगे चलकर यह संदेश दिया कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, उसके बाद प्रकाश का जन्म निश्चित है।
आज अपने आसपास नजर डालें तो अनेक सवाल सामने खड़े दिखाई देते हैं। क्या हम वास्तव में उस समाज की ओर बढ़ रहे हैं जिसकी कल्पना स्वतंत्रता के समय की गई थी? क्या विकास के साथ हमारी संवेदनशीलता भी बढ़ी है? क्या तकनीक ने मनुष्य को बेहतर बनाया है? क्या राजनीति में विचार और समाज में संवाद मजबूत हुआ है? ऐसे प्रश्नों के बीच कृष्ण का स्मरण केवल धार्मिक परंपरा नहीं रह जाता, बल्कि आत्ममंथन का अवसर बन जाता है।
कृष्ण के व्यक्तित्व में जीवन के अनेक रंग
कृष्ण ने जीवन को किसी एक रंग में नहीं देखा। वे गोकुल के नटखट कान्हा हैं, वृंदावन के मुरलीधर हैं, मथुरा में कंस के अत्याचार का अंत करने वाले योद्धा हैं और कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सारथी भी। उनके व्यक्तित्व में प्रेम है तो नीति भी, करुणा है तो साहस भी, संगीत है तो संघर्ष भी।
शायद यही वजह है कि हजारों वर्ष बाद भी कृष्ण आज के मनुष्य के बेहद करीब दिखाई देते हैं।
आज समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक भरोसे और संवाद का संकट भी है। परिवारों में बातचीत कम हो रही है, रिश्तों में अपेक्षाएं बढ़ रही हैं और सामाजिक जीवन में धैर्य घट रहा है। सोशल मीडिया ने संवाद के नए रास्ते जरूर खोले हैं, लेकिन इसके साथ प्रतिक्रियाओं की एक ऐसी दुनिया भी बनाई है, जहां कुछ शब्द, एक तस्वीर या अधूरी सूचना तनाव का कारण बन सकती है।
ऐसे समय में कृष्ण का संदेश हमें विवेक की याद दिलाता है—हर बात पर तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले उसे समझना और फिर निर्णय लेना जरूरी है।
कर्म का संदेश आज भी प्रासंगिक
कृष्ण का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि जीवन केवल परिस्थितियों से नहीं, बल्कि हमारे दृष्टिकोण और कर्मों से भी संचालित होता है। महाभारत में उन्होंने युद्ध के बीच खड़े अर्जुन को कर्म का संदेश दिया। उन्होंने पलायन का रास्ता नहीं दिखाया, बल्कि यह समझाया कि जब सामने अन्याय हो तो अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
आज के दौर में यह संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। भ्रष्टाचार, महिलाओं के प्रति अपराध, कमजोरों का शोषण, झूठ और अफवाहों का प्रसार अथवा सार्वजनिक जीवन में बढ़ती कटुता—इन सबके सामने समाज की चुप्पी भी एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है।
हर व्यक्ति अपने-अपने जीवन में किसी न किसी ‘कुरुक्षेत्र’ में खड़ा है। सवाल यह है कि वह सही समय पर सही पक्ष चुनता है या सुविधा के लिए मौन रह जाता है।
धर्म का अर्थ कर्तव्य और न्याय
कृष्ण ने धर्म को किसी संकीर्ण दायरे में नहीं बांधा। उनके संदेश में धर्म का अर्थ कर्तव्य, न्याय और सत्य के पक्ष में खड़े होने से जुड़ता है। यही कारण है कि गीता का संदेश आज भी प्रासंगिक दिखाई देता है।
आज हमारे पास विज्ञान है, तकनीक है, संचार के आधुनिक साधन हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है और आर्थिक अवसरों के अनेक रास्ते हैं। लेकिन यदि इन सबके बीच विवेक और नैतिकता कमजोर पड़ जाए तो विकास अधूरा रह जाता है।
तकनीकी प्रगति मनुष्य को सुविधाएं दे सकती है, लेकिन उसे बेहतर मनुष्य बनाने का काम विवेक, संवेदना और नैतिकता ही कर सकती है।
राजनीति भी कृष्ण से सीख सकती है संवाद
आज की राजनीति भी कृष्ण के संदेश से बहुत कुछ सीख सकती है। राजनीति लोकतंत्र की सेवा का माध्यम है, केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं। विरोधी विचार रखने वाला व्यक्ति शत्रु नहीं होता।
कृष्ण ने संवाद को महत्व दिया। महाभारत के युद्ध से पहले उन्होंने शांति का प्रयास किया। इसका संदेश स्पष्ट है कि संघर्ष अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं।
आज सार्वजनिक जीवन में संवाद की जगह आरोप-प्रत्यारोप और कटुता बढ़ती दिखाई देती है। ऐसे समय में कृष्ण के शांति-दूत वाले रूप को याद करना जरूरी है।
कृष्ण-सुदामा की मित्रता का संदेश
कृष्ण हमें यह भी सिखाते हैं कि सफलता का अर्थ दूसरों को पीछे छोड़ देना नहीं है। गोकुल का कान्हा अपने मित्रों के बीच सहज है। कृष्ण और सुदामा की कथा बताती है कि सच्ची मित्रता में पद, धन और प्रतिष्ठा का महत्व नहीं होता।
आज जब रिश्तों का मूल्य कई बार आर्थिक और सामाजिक हैसियत से तय होने लगा है, तब कृष्ण-सुदामा का संबंध हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी संवेदना और व्यवहार से होती है।
और शायद आज सबसे अधिक जरूरत इसी संवेदना की है।
हमारे शहर बढ़ रहे हैं, इमारतें ऊंची हो रही हैं, सड़कें विस्तृत हो रही हैं और अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारे भीतर का मनुष्य भी उतना ही बड़ा हो रहा है?
किसी गरीब की परेशानी देखकर हम कितनी देर रुकते हैं? किसी बुजुर्ग के अकेलेपन की आवाज कितनी दूर तक पहुंचती है? किसी बच्चे के सपने को पूरा करने में हम कितना योगदान देते हैं? किसी पीड़ित के लिए हमारी आवाज कितनी मजबूत होती है?
जन्माष्टमी आत्ममंथन का पर्व भी
जन्माष्टमी इन सवालों से बचने का नहीं, बल्कि उनका सामना करने का पर्व है। इस बार जब मंदिरों में घंटियां बजेंगी, घरों में झूले सजेंगे और आधी रात को कान्हा के जन्म का उत्सव मनाया जाएगा, तब शायद हमें एक पल ठहरकर सोचना चाहिए कि हम किस कृष्ण को याद कर रहे हैं।
माखन चुराने वाले बाल कृष्ण को? बांसुरी बजाने वाले मुरलीधर को? या अर्जुन के सारथी पार्थसारथी को?
सच तो यह है कि आज हमें तीनों की जरूरत है। जीवन में बाल कृष्ण की सहजता चाहिए, मुरलीधर का प्रेम चाहिए और पार्थसारथी का विवेक भी। अन्याय के सामने खड़े होने का साहस चाहिए और अपने निर्णयों में धर्म का बोध भी।
कृष्ण का आना क्या है?
कृष्ण के आने का अर्थ शायद किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करना नहीं है।
कृष्ण तब आते हैं, जब कोई अन्याय के सामने सच बोलता है।
कृष्ण तब आते हैं, जब कोई कमजोर का हाथ थामता है।
कृष्ण तब आते हैं, जब कोई सत्ता से ऊपर सत्य को महत्व देता है।
कृष्ण तब आते हैं, जब कोई अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के बारे में सोचता है।
इसलिए आज जरूरत आसमान की ओर देखकर यह पूछने की नहीं कि कृष्ण कब आएंगे। जरूरत अपने भीतर झांककर यह देखने की है कि क्या हम उनके आने लायक समाज बना रहे हैं।
द्वापर में कृष्ण देवकी के गर्भ से जन्मे थे। आज शायद उन्हें किसी गर्भ से जन्म लेने की जरूरत नहीं है। आज उन्हें हमारे विचारों में जन्म लेना है, हमारे व्यवहार में उतरना है, हमारे निर्णयों में दिखाई देना है और हमारे समाज की संवेदना में जीवित होना है।
फिर भी मन की पुकार यही है—
हे कृष्ण, तुम फिर आ जाओ...
आओ तो इस बार किसी कारागार में नहीं, हमारे भीतर जन्म लेना। आओ तो किसी एक कंस का अंत करने नहीं, बल्कि हमारे भीतर के अहंकार, लोभ और भय को समाप्त करने।
आओ और हमें समझाओ कि धर्म किसी मंदिर की दीवारों तक सीमित नहीं है, वह हमारे आचरण में दिखाई देता है। आओ और फिर से कहो—कर्म करो, सत्य के साथ खड़े रहो और परिणाम की चिंता में अपने कर्तव्य से मत हटो।
क्योंकि आज भी समाज को एक कृष्ण की जरूरत है और शायद उससे भी ज्यादा जरूरत है कृष्ण के विचारों को अपने भीतर जगाने की।
(विनायक फीचर्स)
