ॐ नमः परमात्मने : जीवन की साधना
मनुष्य का सच्चा शत्रु और सच्चा मित्र उसका अपना मन ही है।
जिस व्यक्ति का मन उसके नियंत्रण में नहीं है, वह वास्तव में विवश हो जाता है। यदि मन अशांत है, तो हिमालय जैसी गहरी शांति भी अशांति का अनुभव कराने लगती है। बाहरी अशांति कहीं से नहीं आती, उसका मूल स्रोत हमारे भीतर का ही अशांत मन है। जिसने अपने मन पर विजय पा ली, वही सच्चा साधक और साधु कहलाता है।
मन की प्रकृति
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मन कभी संतुष्ट नहीं होता और न ही एक क्षण स्थिर रहता है।
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यह हमें बार-बार अभाव, दुःख और असंतोष की ओर खींचता है।
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जब भी हमें उचित सम्मान नहीं मिलता, मन स्वयं को अपमानित महसूस कराता है।
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मन सदैव अहम का पोषण चाहता है, और जैसे ही अहम को ठेस पहुँचती है, दुःख जन्म लेता है।
साधना का सार
मन को साधना ही जीवन की सबसे बड़ी साधना है।निरंतर अभ्यास और आत्म-जागरूकता से मन को नियंत्रित किया जा सकता है।जो व्यक्ति अपने भीतर शांति पा लेता है, उसके लिए बाहरी जगत भी पूर्णतः शांत और सुखदायी हो जाता है। सच्चा साधक वही है जो अपने मन को जीत ले। जीवन की वास्तविक साधना कोई बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि मन पर नियंत्रण है। जब मन शांत होता है, तब सम्पूर्ण जीवन आनंद और शांति से भर जाता है।
