काल भैरव की उत्पत्ति कथा : ब्रह्मा के अहंकार का अंत और शिव आज्ञा से भैरव का जन्म
ब्रह्मा के पांचवें सिर का घमंड
एक समय देवता, ऋषि और साधु-संतों की सभा में ब्रह्मा जी अपने पांचवें सिर से भगवान शिव के बारे में अपमानजनक शब्द कहने लगे। ब्रह्मा के इस अहंकार और असत्य वचनों से समस्त देव समुदाय व्याकुल हो उठा। उसी क्षण एक दिव्य शिवलिंग से तेजोमय रूप में एक बालक प्रकट हुआ — वही बालक आगे चलकर भैरव कहलाए।
भैरव द्वारा ब्रह्मा का पांचवां सिर काटना
जब भैरव ने देखा कि ब्रह्मा जी मर्यादा का उल्लंघन कर रहे हैं, तो उन्होंने अपने तीक्ष्ण नाखूनों से ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया और उसे अपने हाथ में धारण कर लिया। उसी क्षण भगवान शिव वहाँ प्रकट हुए और भैरव से बोले —भैरव, तुमने ब्रह्मा का मस्तक काटकर ब्रह्म हत्या का पाप किया है। अब तुम्हें इस पाप से मुक्ति पाने के लिए त्रैलोक्य (तीनों लोकों) की यात्रा करनी होगी। जहाँ यह सिर तुम्हारे हाथ से स्वतः गिर जाएगा, वहीं तुम इस पाप से मुक्त हो जाओगे।”
ब्रह्म हत्या देवी का पीछा
यह कहकर शिव ने एक भयंकर रूप धारण करने वाली तेजस्वी देवी को प्रकट किया, जिनके हाथ में खप्पर और तलवार थी, और जीभ रक्त से लाल थी। वह देवी ब्रह्म हत्या कहलाईं और उन्हें आदेश दिया गया कि वे भैरव का निरंतर पीछा करें, ताकि वह कहीं विश्राम न पा सकें। भैरव अपने पाप के प्रायश्चित के लिए तीनों लोकों में भटकते रहे, और ब्रह्म हत्या देवी हर स्थान पर उनका पीछा करती रहीं।
काशी में मुक्ति
अंततः एक दिन भैरव काशी नगरी (वाराणसी) में प्रवेश कर गए। भगवान शिव के आदेशानुसार ब्रह्म हत्या देवी को उस पवित्र नगरी में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। जैसे ही भैरव काशी पहुंचे, ब्रह्मा का वह कटा हुआ सिर उनके हाथ से स्वतः गिर पड़ा। वहीं वे अपने पाप से मुक्त हो गए। यह स्थान कपालमोचन तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
काशी के कोतवाल बने भैरव
भगवान शिव ने काशी में ही भैरव को नगरी का कोतवाल (रक्षक देवता) नियुक्त किया। आज भी काशी के काल भैरव को “काशी के कोतवाल” के रूप में पूजा जाता है। इसके अतिरिक्त उज्जैन नगरी में स्थित काल भैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है, जहाँ प्रतिदिन असंख्य भक्त दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
