शिवलिंग की उत्पत्ति कथा: दारुक वन से जुड़ी पौराणिक मान्यता

Origin story of Shivling: Mythological belief related to Daruk forest
 
Origin story of Shivling: Mythological belief related to Daruk forest
शिव पुराण में कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि ऋषियों ने महादेव को श्राप देकर पाताल लोक भेजा हो। किंतु एक प्रसंग मिलता है जिसमें बताया गया है कि दारुक वन में घटी घटना के बाद ही शिवलिंग की पूजा का प्रचलन आरंभ हुआ। इस कथा के अनुसार, महादेव की अद्भुत लीला और पार्वतीजी की कृपा से शिवलिंग की स्थापना हुई।

दारुक वन की कथा

1. दारुक वन में शिवजी का आगमन
प्राचीन समय में कुछ ऋषि दारुक वन में कठोर तपस्या कर रहे थे। तभी भगवान शिव वहां नग्न रूप में प्रकट हुए। उनके इस स्वरूप को देखकर वहां की स्त्रियों में आकर्षण और कामभावना जागृत हो गई।

2. ऋषियों का क्रोध
ऋषियों ने यह दृश्य देखकर शिवजी को पहचान न पाया और क्रोधित होकर उन्हें अपशब्द कहे। यहां तक कि उन्होंने भगवान के लिंग पर पत्थर से प्रहार कर दिया।

3. लिंग का पृथ्वी पर पतित होना
शिवजी का लिंग पृथ्वी पर गिरा और उससे अग्नि के समान प्रचंड ज्योति निकलने लगी। यह दृश्य इतना भयावह था कि तीनों लोकों में हाहाकार मच गया।

4. ब्रह्माजी का परामर्श
ऋषियों ने इस संकट से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्माजी से सहायता मांगी। ब्रह्माजी ने कहा कि इस अग्निरूपी लिंग को केवल भगवान शिव या देवी पार्वती ही धारण कर सकती हैं।

5. पार्वतीजी की कृपा
ऋषियों ने देवी पार्वती की आराधना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर पार्वतीजी ने उस लिंग को अपनी योनि में धारण कर लिया। तभी से तीनों लोकों में शिवलिंग की पूजा का प्रारंभ हुआ और यह परंपरा आज तक प्रचलित है।

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