राजा कंस नारायण और दुर्गोत्सव की परंपरा

The tradition of King Kansa Narayan and Durga Puja
 
राजा कंस नारायण और दुर्गोत्सव की परंपरा

(मृणांक शेखर घोषाल – विनायक फीचर्स)

दुर्गोत्सव की परंपरा भारतीय संस्कृति में अत्यंत प्राचीन और गहरी जड़ें रखती है। ऋग्वेद में अंबिका, तैत्तिरीयारण्यक में उमा और हेमवती, नारायण उपनिषद तथा दुर्गागायत्री में देवी दुर्गा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मार्कंडेय पुराण, देवी भागवत, देवी पुराण और कालिका पुराण में भी उनके पूजन की महिमा वर्णित है। माना जाता है कि सबसे पहले राजा सुरथ ने ऋषि मेधम की प्रेरणा से देवी की आराधना की थी। हालांकि यह पूजा किस ऋतु में हुई थी, इसका उल्लेख नहीं मिलता। कुछ कथाओं के अनुसार यह वसंत ऋतु में सम्पन्न हुई थी।

ऐतिहासिक संदर्भ और शरदकालीन दुर्गापूजा

इतिहासकार मानते हैं कि बंगाल और बिहार की सीमा पर स्थित गौड़ देश के समाधि वैश्य और वीरभूम जिले के राजा सुरथ ने अयोध्या के ब्राह्मण मेघस मुनि के मार्गदर्शन में शरद ऋतु में कर्णफुली नदी के तट पर मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की थी। यही कारण है कि शरदकालीन दुर्गोत्सव का महत्व बढ़ता गया।
रामायण में उल्लेख मिलता है कि भगवान राम ने रावण वध से पूर्व शरद ऋतु में देवी दुर्गा का बोधन किया था, जिसे अकाल बोधन कहा जाता है। वहीं, महाभारत में अर्जुन द्वारा युद्ध विजय हेतु देवी स्तुति का उल्लेख मिलता है।

सार्वजनिक दुर्गोत्सव और सेन वंश

कई विद्वान मानते हैं कि दुर्गोत्सव को सार्वजनिक स्वरूप सबसे पहले सेन वंश के राजाओं ने दिया। वे मैसूर से आकर गौड़वाना के सिंहासन पर बैठे और वहां की संस्कृति में अपनी परंपराओं का प्रभाव डाला। उनके प्रयास से बंगाल में दुर्गा प्रतिमा निर्माण और पूजा का चलन और भी व्यापक हुआ।

राजा कंस नारायण और दुर्गोत्सव का विस्तार

16वीं शताब्दी में बंगाल के राजशाही प्रांत (वर्तमान बांग्लादेश) के ताहिरपुर क्षेत्र के जमींदार राजा कंस नारायण ने दुर्गापूजा को नए ऐतिहासिक रूप में प्रस्तुत किया। कहा जाता है कि वे धर्मपरायण थे और बड़े यज्ञ कराने की इच्छा रखते थे। जब उनके पुरोहित रमेश शास्त्री ने समझाया कि राजसूय, अश्वमेध और अन्य महायज्ञ उनके लिए संभव नहीं हैं, तो उन्होंने दुर्गोत्सव आयोजित करने का सुझाव दिया।

कंस नारायण ने इसे सहर्ष स्वीकार किया और व्यापक स्तर पर दुर्गा प्रतिमा बनवाकर पूजा का आयोजन किया। इसमें लाखों रुपए खर्च हुए और पूरे बंगाल में नई धार्मिक चेतना का संचार हुआ। उनकी पूजा से प्रभावित होकर अन्य जमींदार और राजघराने भी दुर्गोत्सव मनाने लगे। धीरे-धीरे यह उत्सव सार्वजनिक स्वरूप लेने लगा।

अन्य शासकों का प्रयास और परिणाम

कंस नारायण की तरह भादुड़ा के राजा जगतनारायण ने भी दुर्गोत्सव का आयोजन किया। किंतु उनकी पूजा सफल नहीं मानी गई क्योंकि उसमें भक्ति से अधिक प्रतिस्पर्धा और दिखावा था। यह माना गया कि भक्ति और श्रद्धा से सम्पन्न पूजा ही फलदायी होती है।

आगे की परंपरा

कुछ इतिहासकारों का मत है कि 19वीं शताब्दी में वंगाधिप हरिवर्मा देव के प्रधानमंत्री भवदेव भट्ट ने शारदीय महापूजा की पद्धति का संकलन किया। वहीं, शूलपाणि (1375-1460) ने वासंती पूजा की पद्धति लिखी थी। धीरे-धीरे शारदीय दुर्गोत्सव ने व्यापक और सार्वजनिक स्वरूप ग्रहण किया। यद्यपि दुर्गोत्सव की उत्पत्ति और स्वरूप पर विभिन्न मत हैं, किंतु यह निश्चित है कि राजा कंस नारायण की पूजा ने इसे ऐतिहासिक और जन-आंदोलन जैसा रूप प्रदान किया। उनकी प्रेरणा से ही बंगाल और भारत के अन्य हिस्सों में दुर्गोत्सव एक भव्य और जनसामान्य का उत्सव बन गया।

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