Sahasra Shivarchan Vidhi: सावन में चमत्कारी सहस्र शिवार्चन से प्रसन्न होंगे महादेव, जानें सामग्री, नियम और पूजा विधि
क्या है 'सहस्र शिवार्चन'?
ज्योतिषाचार्य सुजीत जी महाराज (गोरखपुर) के अनुसार, शिवार्चन एक अत्यंत प्रभावशाली और सुलभ आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इसमें भगवान शिव के 1000 दिव्य सहस्रनामों का पाठ करते हुए प्रत्येक नाम के साथ शिवलिंग पर 1 बेलपत्र और 1 किशमिश श्रद्धापूर्वक अर्पित की जाती है।
यदि घर में पहले से शिवलिंग स्थापित न हो, तो गंगाजल या शुद्ध जल में मिट्टी मिलाकर निर्मित पार्थिव शिवलिंग पर भी यह अनुष्ठान पूरी निष्ठा के साथ किया जा सकता है।
पूजा के लिए आवश्यक सामग्री
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शिवलिंग या शुद्ध मिट्टी (पार्थिव शिवलिंग हेतु)
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1000 बेलपत्र (त्रिदल)
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1000 साबुत किशमिश
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गंगाजल व शुद्ध जल
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सुगंधित पुष्प (विशेषकर नीले/सफेद अपराजिता के फूल)
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अक्षत (अखंडित चावल), इत्र (परफ्यूम/अत्तर)
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नैवेद्य (फल, मिठाई या घर में बनी खीर)
सहस्र शिवार्चन की सरल पूजन विधि
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प्रथम पूज्य का ध्यान: सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश, माता पार्वती, स्वामी कार्तिकेय और नंदी जी का स्मरण करें।
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संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करते हुए पूजा का संकल्प लें और सामग्री को शिवलिंग के समीप अर्पित कर दें।
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जलाभिषेक: शुद्ध जल या गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करें।
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सुगंध अनुष्ठान: हाथ में अक्षत, इत्र और सुगंधित पुष्प लेकर दोनों हथेलियों से तब तक सहलाएं जब तक कि दिव्य सुगंध न उठने लगे। तत्पश्चात इन फूलों को महादेव को समर्पित करें।
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सहस्रनाम अर्पण: शिव जी के 1000 नामों का जाप प्रारंभ करें। प्रत्येक नाम (जैसे- 'ॐ स्थिराय नमः') के उच्चारण के साथ दाहिने हाथ से 1 बेलपत्र और 1 किशमिश शिवलिंग पर चढ़ाते जाएं।
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आरती व भोग: 1000 नाम पूर्ण होने पर धूप-दीप से भोलेनाथ की महाआरती करें और खीर या फल का भोग लगाएं।
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दान का नियम: पूजन में अर्पित की गई 1000 किशमिश का स्वयं सेवन कदापि न करें। इन्हें किसी योग्य ब्राह्मण या मंदिर में दान कर दें। प्रसाद के रूप में केवल अलग से लगाया गया भोग (खीर/फल) ही ग्रहण करें।
यदि किसी कारणवश 1000 बेलपत्र उपलब्ध न हो सकें, तो जितने उपलब्ध हों उतने चढ़ाएं। इसके बाद केवल किशमिश अर्पित करते हुए शिव सहस्रनाम का पाठ जारी रखें। इससे भी अनुष्ठान पूर्ण माना जाता है।
सहस्र शिवार्चन करने के अद्भुत लाभ
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आर्थिक उन्नति: यदि व्यापार में नुकसान हो रहा हो या कंगाली बनी हो, तो यह अनुष्ठान धन आगमन के नए मार्ग खोलता है।
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ग्रह दोषों से मुक्ति: कुंडली में स्थित कालसर्प, शनि या राहू-केतु जैसे उग्र ग्रह दोषों का प्रभाव शांत होता है।
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आरोग्य लाभ: दीर्घकालिक रोगों व शारीरिक कष्टों से राहत मिलती है और घर में सुख-शांति का वास होता है।
