अंगभूमि भागलपुर की ठाकुरबाड़ियों में झूलनोत्सव की भव्य छटा
(रिपोर्ट: शिव शंकर सिंह पारिजात | विनायक फीचर्स) श्रावण मास की शुभ बेला में अंगभूमि भागलपुर की प्राचीन ठाकुरबाड़ियाँ राधा-कृष्ण के प्रेममय झूलनोत्सव से सराबोर हो उठी हैं। यह उत्सव श्रावण शुक्ल एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक पांच दिनों तक बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 5 अगस्त से 9 अगस्त तक चलेगा।
झूलनोत्सव न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व है, बल्कि यह सावन की सौंधी मिट्टी में राधा-कृष्ण की झूला लीला का सजीव अनुभव कराता है। प्रकृति भी इस अवसर पर श्रृंगार कर जैसे उत्सव में सम्मिलित हो जाती है—घने बादल, रिमझिम फुहारें और हरियाली वातावरण को भाव-विभोर कर देते हैं।

इस दौरान श्रीधाम वृंदावन के मंदिरों से लेकर देश के कोने-कोने तक स्थित ठाकुरबाड़ियों में श्रीराधा-कृष्ण की झांकी सजाई जाती है, विशेष झूलों पर उन्हें विराजमान कर भजन-कीर्तन और छप्पन भोग के साथ आराधना की जाती है। अंगप्रदेश की राजधानी रहे भागलपुर में यह पर्व विशेष रूप से उल्लास के साथ मनाया जाता है।
भागलपुर की प्रमुख झूलनोत्सव परंपराएँ
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बाबा बूढ़ानाथ मंदिर: यहाँ राधा-कृष्ण की झांकी को प्रतिदिन विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं। अंतिम दिन भव्य छप्पन भोग का आयोजन होता है।
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अलीगंज की ठाकुरबाड़ी: भगवान को नये वस्त्रों से सजाकर विशेष भजन-कीर्तन और छप्पन भोग की परंपरा निभाई जाती है।
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अनंतराम मारवाड़ी टोला: पारंपरिक कीर्तन और रंगबिरंगे पुष्पों से सज्जा के साथ अंतिम दिन की आरती भव्य रूप ले लेती है।
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गोशाला महादेव मंदिर: राधा-कृष्ण की आराधना में घंटियों और शंखनाद के साथ ‘राधे-राधे’ की गूंज वातावरण को भक्तिमय बना देती है।
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कूपेश्वरनाथ महादेव मंदिर, वैरायटी चौक: यहां रेशमी वस्त्रों और आभूषणों से सजाकर श्रद्धालुओं द्वारा पारंपरिक गीतों के साथ पूजा होती है।
पुरातन गाथाएं और संरक्षण की पुकार
नाथनगर और चम्पानगर जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर भी झूलन महोत्सव की धूम रहती है। नाथनगर रेलवे स्टेशन के समीप स्थित गग्गरा पुष्करिणी सरोवर क्षेत्र की ठाकुरबाड़ियों में भी पूजन-अनुष्ठान होते हैं। मुंदीचक मोहल्ले के सभी राधा-कृष्ण मंदिरों में भव्यता के साथ पर्व मनाया जाता है।
टी.एन.जे. कॉलेजिएट स्कूल के पीछे गंगा तट पर स्थित रघुनंदन प्रसाद ठाकुरबाड़ी अपनी संगमरमर की उत्कृष्ट कारीगरी और स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है। वहीं भागलपुर की सबसे ऐतिहासिक और भव्य ठाकुरबाड़ी — बरारी सीढ़ीघाट स्थित राधा-कृष्ण मंदिर, जो कि लगभग सौ वर्ष पुराना है, आज अपनी उपेक्षा पर मौन आंसू बहा रहा है। अष्टकोणीय रास मंच शैली में निर्मित यह मंदिर रोमन और हिन्दू वास्तुकला का अद्भुत संगम है।
इस मंदिर में पहले पीतल की भव्य मूर्ति थी जिसे सुरक्षा कारणों से अन्यत्र स्थानांतरित किया गया है। फिलहाल अष्टधातु की मूर्ति स्थापित है। इस परिसर में कभी स्थित नरसिंह मंदिर अब ध्वस्त हो चुका है, परंतु उसकी श्वेत संगमरमर की प्रतिमा अब भी श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है।
एक धरोहर, जिसे संरक्षण की आवश्यकता
बरारी का यह मंदिर विक्रमशिला सेतु से देखने पर किसी जलमहल की भांति प्रतीत होता है। परंतु समय की मार, देखरेख की कमी और प्रशासनिक उपेक्षा के चलते यह धरोहर धीरे-धीरे विलीन हो रही है। यदि समय रहते इसके संरक्षण की ओर ध्यान दिया जाए, तो यह स्थान एक धार्मिक व पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकता है। भागलपुर की अन्य कई ठाकुरबाड़ियाँ भी इसी तरह उपेक्षित अवस्था में हैं जिन्हें बचाने की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ हमारी सांस्कृतिक धरोहरों से वंचित न रहें।
