अगस्त्य ऋषि और माता अन्नपूर्णा जी की अद्भुत कथा
अगस्त्य मुनि न केवल तपस्वी और महाशक्तिशाली ऋषि थे, बल्कि वे भगवान शिव के परम भक्त भी थे। उनकी महिमा से जुड़ी एक और अद्भुत कथा माता अन्नपूर्णा जी (पार्वती जी) से संबंधित है।
एक बार माता पार्वती ने शिवजी से इच्छा प्रकट की कि वे समस्त साधु-संतों और ऋषि-मुनियों को भोजन कराना चाहती हैं। शिवजी ने यह निमंत्रण भेजा और देखते ही देखते लाखों साधु-संत कैलाश पर एकत्रित हो गए। माता ने असीमित व्यंजन बनवाए, जिन्हें खाकर भी संतों का पेट जल्दी भर गया और बहुत सारा भोजन बच गया।
पार्वती जी ने आश्चर्यचकित होकर शिवजी से कहा—“प्रभु, ये कैसे साधु हैं जो थोड़ा-सा खाकर ही तृप्त हो गए? आप किसी ऐसे महात्मा को बुलाइए जो भरपेट खा सके।”
शिवजी मुस्कुराए और अपने परम भक्त अगस्त्य ऋषि को आमंत्रित किया। अगस्त्य मुनि आए और माता द्वारा बनाए गए व्यंजनों को खाते गए। बार-बार भोजन तैयार किया गया और बार-बार अगस्त्य जी ने उसे समाप्त कर दिया, परंतु उनका पेट खाली ही रहा। अब माता पार्वती जी को अपनी भूल का अहसास हुआ और वे लज्जित हो गईं। उन्होंने शिवजी से प्रार्थना की कि मेरी लाज बचाइए, वरना लोग कहेंगे कि अन्नपूर्णा देवी एक साधु का भी पेट नहीं भर सकीं।
तब महादेव विष्णु जी के पास गए। भगवान विष्णु साधु का वेश धारण कर आए और अगस्त्य ऋषि के साथ बैठकर थोड़ी-सी थाली में भोजन किया। वे बार-बार “तृप्तोस्मि, तृप्तोस्मि” कहते रहे। जैसे ही भगवान विष्णु संतुष्ट हुए, उसी क्षण पूरा जगत तृप्त हो गया और अगस्त्य ऋषि का पेट भी भर गया। ऋषि ने तुरंत पहचान लिया कि यह कोई साधारण साधु नहीं, बल्कि स्वयं जगन्नाथ भगवान हैं।
भगवान विष्णु ने अगस्त्य जी से कहा—“जल पीने का समय अभी नहीं आया है। द्वापर के अंत में जब मैं श्रीकृष्ण रूप में गोवर्धन लीला करूँगा, तब तुम्हें भरपूर जल पिलाऊँगा।”
और ठीक ऐसा ही हुआ। जब इन्द्रदेव ने अभिमान में आकर मूसलधार वर्षा से ब्रज को डुबो दिया, तब श्रीकृष्ण ने अगस्त्य ऋषि का स्मरण किया। अगस्त्य मुनि आए और एक ही बार में समस्त जल को पीकर ब्रजवासियों को संकट से मुक्त कर दिया।
