ब्रह्मांड की सबसे कठिन परीक्षा जब भक्त ने भगवान की छाती पर प्रहार किया
The Hardest Test in the Universe When a Devotee Hit God's Chest
Thu, 1 Jan 2026
यह केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि सहनशीलता, करुणा और क्षमा की वह दिव्य पराकाष्ठा है, जिसने तिरुमला के भगवान श्री वेंकटेश्वर की लीला की आधारशिला रखी।
1. ऋषियों का महासम्मेलन और धर्मसंकट
सरस्वती नदी के पावन तट पर एक विशाल यज्ञ आयोजित किया गया। देश–काल से परे महान ऋषि, मुनि और तपस्वी वहाँ एकत्र हुए। यज्ञ की पूर्णाहुति के समय एक गूढ़ प्रश्न उठा—
“इस महायज्ञ का प्रधान फल किसे अर्पित किया जाए?”
सृष्टि की तीन महाशक्तियाँ हैं—
ब्रह्मा : सृजनकर्ता
शिव : संहारक
विष्णु : पालनहार
निर्णय यह करना था कि इन तीनों में त्रिगुणातीत और परम सात्त्विक कौन है—जो अहंकार और क्रोध से पूर्णतः मुक्त हो।
यह दायित्व महर्षि भृगु को सौंपा गया। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र होते हुए भी वे अपने तीव्र स्वभाव के लिए जाने जाते थे। भृगु ऋषि ने कहा—
“मैं स्वयं तीनों की परीक्षा लेकर सत्य उद्घाटित करूँगा।
2. सत्यलोक में ब्रह्मा की परीक्षा
महर्षि भृगु सबसे पहले सत्यलोक पहुँचे। वहाँ ब्रह्मा जी सभा में विराजमान थे। भृगु ने न प्रणाम किया, न स्तुति—सीधे जाकर एक ओर आसन ग्रहण कर लिया।पुत्र का यह व्यवहार ब्रह्मा जी को भीतर ही भीतर क्रोधित कर गया। यद्यपि उन्होंने कुछ कहा नहीं, पर उनके मन में रजोगुण का उदय हो चुका था। भृगु ऋषि ने तपोबल से उनके मनोभाव जान लिए और निश्चय किया—
“जहाँ सम्मान की अपेक्षा हो, वहाँ परम शांति नहीं हो सकती।”
वे मौन भाव से वहाँ से चले गए।
3. कैलाश में शिव की परीक्षा
इसके बाद भृगु ऋषि कैलाश पहुँचे। भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान थे। शिव जी अपने भाई समान भृगु को देखकर प्रेमपूर्वक उन्हें गले लगाने आगे बढ़े।
लेकिन भृगु ने अपमानजनक शब्द कह दिए—
“रुकिए महादेव! आप श्मशानवासी हैं, भस्म रमाते हैं। मुझे स्पर्श न करें।”
क्षण भर में शिव जी का रौद्र रूप प्रकट होने लगा। तीसरा नेत्र खुलने ही वाला था कि माता पार्वती ने उनके चरण पकड़कर उन्हें शांत किया।
भृगु ऋषि समझ गए—
“जहाँ क्रोध शीघ्र प्रकट हो जाए, वहाँ तमोगुण का वास होता है।
4. वैकुंठ में वह अकल्पनीय घटना
अंततः भृगु ऋषि वैकुंठ पहुँचे। भगवान विष्णु शेषनाग पर योगनिद्रा में थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं। ऋषि को यह अपमान प्रतीत हुआ। क्रोध में आकर उन्होंने वह कर दिया जिसकी कल्पना भी असंभव थी—
उन्होंने भगवान विष्णु की छाती पर लात मार दी।
5. क्षमा की पराकाष्ठा
भगवान नारायण तुरंत उठे। न क्रोध, न शाप—बल्कि वे भृगु ऋषि के चरणों में गिर पड़े और बोले—
“हे ब्रह्मर्षि! मेरी छाती वज्र समान कठोर है, कहीं आपके कोमल चरणों को चोट तो नहीं लगी?”
वे स्वयं ऋषि के पैर दबाने लगे।
यह देखकर भृगु ऋषि का अहंकार टूट गया। आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्होंने जान लिया— यही है सच्चा सात्त्विक स्वरूप।
6. लक्ष्मी का वैकुंठ त्याग
माता लक्ष्मी यह सब देखकर आहत हो उठीं। उन्होंने कहा स्वामी! इसने मेरे निवास स्थान पर प्रहार किया है, और आप इसे दंड देने के बजाय सम्मान दे रहे हैं?” भगवान विष्णु ने शांत स्वर में उत्तर दिया देवि, क्षमा ही मेरा धर्म है।
पर लक्ष्मी जी का स्वाभिमान आहत हो चुका था। वे वैकुंठ त्यागकर पृथ्वी लोक चली गईं।
यहीं से श्रीनिवास बनकर भगवान विष्णु के अवतरण और तिरुपति बालाजी की लीला का आरंभ होता है।
7. अंतिम निर्णय
भृगु ऋषि ने लौटकर ऋषियों की सभा में कहा
“ब्रह्मा मान चाहते हैं, शिव अपमान सहन नहीं कर सकते,किन्तु नारायण ही ऐसे हैं जिन्होंने अपमान का उत्तर करुणा से दिया।
वही सर्वोत्तम हैं।
