साल 2026 में दो ज्येष्ठ माह: 8 साल बाद बन रहा है दुर्लभ संयोग, जानें क्या होता है अधिकमास, इसका महत्व और नियम
(अंजनी सक्सेना- विभूति फीचर्स) हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 बेहद विशेष होने जा रहा है क्योंकि इस साल दो ज्येष्ठ मास होंगे। अंग्रेजी कैलेंडर के 365 दिनों के भीतर ही इन तिथियों का समायोजन होगा। ज्योतिष और खगोलशास्त्र के अनुसार, 8 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद दो ज्येष्ठ का यह दुर्लभ संयोग बन रहा है; इससे पूर्व वर्ष 2018 में ज्येष्ठ माह में अधिकमास का योग बना था। साल 2026 में 17 मई से 15 जून तक की अवधि अधिकमास की रहेगी। कृष्ण और शुक्ल पक्ष के दिनों के मान से यह समय मई और जून के मध्य भाग को कवर करेगा।
क्या होता है अधिकमास और क्षय मास?
अधिकमास को आम बोलचाल में मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इसके निर्धारण के नियम इस प्रकार हैं:
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अधिकमास (मलमास): प्राकृतिक नियमानुसार, एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या के बीच कम से कम एक बार सूर्य की संक्रांति (राशि परिवर्तन) अवश्य होती है। लेकिन जब दो अमावस्या के बीच सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती, तो वह महीना बढ़ा हुआ या 'अधिकमास' कहलाता है। जिस मास में संक्रांति होती है, उसे शुद्ध मास कहते हैं।
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क्षय मास: इसके विपरीत, जिस चंद्र मास में दो सूर्य संक्रांतियों का संक्रमण (एक साथ दो संक्रांति) हो जाता है, उसे क्षय मास कहा जाता है। क्षय मास बहुत दुर्लभ होता है।
क्यों आता है हर तीसरे वर्ष अधिकमास?
यह एक शुद्ध खगोलीय तथ्य है। सूर्य लगभग 30.44 दिनों में एक राशि को पार करता है, जिससे सौर वर्ष 365.24 दिन का होता है। वहीं, चंद्रमा का महीना 29.53 दिनों का होता है, जिससे चंद्र वर्ष केवल 354.32 दिन का रह जाता है। दोनों कैलेंडरों में हर साल लगभग 11 दिन का अंतर आता है। 32.5 महीने (लगभग 3 वर्ष) बीतने पर यह अंतर पूरे 1 महीने के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए हर तीसरे वर्ष एक अधिकमास की व्यवस्था की गई है, ताकि चंद्र मास का गणित न बिगड़े।
अधिकमास का धार्मिक महत्व और अनुष्ठान
शास्त्रों के अनुसार, मलमास को भले ही व्यावहारिक रूप से अशुद्ध माना गया हो, लेकिन आध्यात्मिक उन्नति और पुण्य कमाने के लिए भगवान विष्णु (पुरुषोत्तम) ने इसे अपना नाम दिया है।
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धार्मिक पाठ और श्रवण: इस पूरे महीने में श्रीमद् भागवत कथा, पुरुषोत्तम मास की कथा, हरिवंश पुराण, रामायण, विष्णु स्रोत और रुद्राभिषेक का पाठ करना या सुनना अत्यंत फलदायी माना गया है।
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तीर्थ स्नान और यात्रा: इस दौरान उज्जैन में पुराणोक्त सप्तसागरों (रुद्र, क्षीर, पुष्कर, गोवर्धन, विष्णु, रत्नाकर और पुरुषोत्तम सागर) की यात्रा, स्नान और वहां निर्धारित दान करने का विशेष विधान है।
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मालपुए का विशेष दान: अधिकमास में शुद्ध घी के मालपुए बनाकर प्रतिदिन कांसे के बर्तन में रखकर फल, वस्त्र और दक्षिणा के साथ अपनी सामर्थ्य अनुसार दान करने से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है।
मलमास के नियम: क्या करें और क्या न करें?
इस पवित्र महीने में कुछ विशेष कर्मों को वर्जित माना गया है, जबकि आध्यात्मिक कार्यों को करने की खुली छूट है।
वर्जित कार्य (ये न करें):
मलमास के दौरान किसी भी प्रकार के काम्य (कामना पूर्ति वाले) और मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है:
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विवाह संस्कार, मुंडन, और यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार।
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देव प्रतिष्ठा, गृह प्रवेश (नव वधू प्रवेश), और बच्चे का नामकरण।
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नए वस्त्रों को पहली बार धारण करना और नवीन वाहन या संपत्ति की खरीदारी।
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पराया अन्न और तामसिक भोजन का पूरी तरह त्याग करना चाहिए।
स्वीकार्य कार्य (ये किए जा सकते हैं):
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जो मांगलिक या निर्माण कार्य अधिकमास शुरू होने से पहले ही प्रारंभ किए जा चुके हैं, उन्हें जारी रखा जा सकता है।
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किसी मृत व्यक्ति का प्रथम वार्षिक श्राद्ध इस मास में किया जा सकता है।
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गंभीर रोगों की निवृत्ति के लिए महामृत्युंजय जाप या रुद्र अनुष्ठान कराए जा सकते हैं।
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संतान जन्म के कृत्य, पितृ श्राद्ध, गर्भाधान, पुंसवन और सीमंत संस्कार जैसे आवश्यक कार्य किए जा सकते हैं।
व्रतधारियों के लिए विशेष दिनचर्या
जो श्रद्धालु पूरे एक महीने के नियम या व्रत का पालन करना चाहते हैं, उन्हें भूमि पर शयन (सोना) करना चाहिए और दिन में केवल एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। मलमास के प्रथम दिन प्रात:काल स्नानादि के बाद सूर्य नारायण को पुष्प, चंदन और अक्षत मिश्रित जल से अर्घ्य देकर पूजन से इस व्रत की शुरुआत करनी चाहिए। मास की समाप्ति पर उद्यापन कर ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान-पुण्य करना अनिवार्य माना गया है।
