जब भगवान ने स्वयं ली भक्त धन्नाजी की परीक्षा

When God himself tested his devotee Dhannaji.
 
 सेवा का महायज्ञ

एक बार भगवान ने अपने परम भक्त धन्नाजी की परीक्षा लेने का निश्चय किया। धन्नाजी के गाँव में भयानक अकाल पड़ा हुआ था। चारों ओर भूख, अभाव और निराशा का वातावरण था, फिर भी धन्नाजी अपने सीमित साधनों के बावजूद गाँव के लोगों, साधु-संतों और गरीबों को अन्नदान कर रहे थे। वे मानते थे कि जब तक शरीर में शक्ति है, तब तक सेवा रुकनी नहीं चाहिए। धीरे-धीरे उनका स्वयं का अन्न भंडार भी समाप्त होने लगा, लेकिन उनके संकल्प में कोई कमी नहीं आई।

संत के रूप में आए भगवान

धन्नाजी की निष्काम सेवा से प्रसन्न होकर ठाकुरजी स्वयं एक साधु के वेश में उनके द्वार आए। उन्होंने धन्नाजी को एक बीज दिया और कहा—इसे खेत में बो देना और जो भी उपज हो, उसे गाँव वालों में बाँट देना।”धन्नाजी ने बिना किसी शंका के वैसा ही किया। गाँव के लोग उनका उपहास करने लगे— “इस सूखे में भला कौन-सी फसल उगेगी?”

 चमत्कार की फसल

कुछ समय बाद वही हुआ, जो असंभव माना जा रहा था।धन्नाजी के खेतों में हरियाली लहराने लगी। जब फसल पककर तैयार हुई तो खेतों में बड़े-बड़े तुंबे (तुम्बा फल) लगे हुए थे। धन्नाजी ने सोचाइन तुंबों से कमंडल बनाकर संतों को दे दिया करूँगा।वे सभी तुंबे तोड़कर घर ले आए।

 तुंबों में छिपा हुआ खजाना

जब उन्होंने पहला तुंबा काटा, तो आश्चर्य से स्तब्ध रह गए।तुंबा हीरे-मोती, जवाहरात और बहुमूल्य रत्नों से भरा हुआ था।एक नहीं, बल्कि हर तुंबा की कहानी वही थी।तभी उन्हें उस साधु की याद आई समझ गए कि यह स्वयं भगवान की कृपा थी।

 सेवा का महायज्ञ

इस दिव्य धन को पाकर भी धन्नाजी का मन नहीं बदला।उन्होंने इस धन को सेवा का साधन बनाया।वर्षों तक चले अकाल मेंअपने गाँव और आसपास के सैकड़ों गाँवों मेंउन्होंने निरंतर लंगर चलवायालाखों लोगों को दिन में तीनों समय भोजन मिलाउन्होंने मंदिर, बावड़ियाँ, तालाब और धर्मशालाएँ बनवाईं तथा साधु-संतों और जरूरतमंदों की आजीवन सेवा की।

धन्ना सेठ — धन और मन दोनों के धनी

लोग प्रेम से उन्हें “धन्ना सेठ” कहने लगे।वे केवल धन से नहीं, बल्कि दयालु हृदय और विशाल मन से भी धनी थे।आज भी जब किसी उदार और परोपकारी व्यक्ति की प्रशंसा की जाती है, तो कहा जाता हैवह तो धन्ना सेठ है।धन्नाजी जैसा धनी आज तक कोई नहीं हुआ—क्योंकि उन्होंने धन को नहीं, धर्म, करुणा और सेवा को जीवन का केंद्र बनाया।

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