Ayurvedic Body Detox: शरीर को स्वस्थ रखने में मददगार हो सकती हैं आयुर्वेद की ये 4 पारंपरिक क्रियाएं, जानें इनके फायदे और सावधानियां
गलत खान-पान और खराब दिनचर्या का असर सेहत पर पड़ सकता है। आयुर्वेद में नेति, नस्य, धौती और कपालभाति जैसी पारंपरिक विधियों का उल्लेख मिलता है, लेकिन इन्हें अपनाने से पहले सही जानकारी और विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अनियमित खान-पान, तनाव, प्रदूषण, धूम्रपान, शराब का सेवन और शारीरिक गतिविधियों की कमी लोगों की सेहत को प्रभावित कर रही है। इन आदतों के कारण मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और टाइप-2 डायबिटीज जैसी जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
इसी बीच शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बॉडी डिटॉक्स की चर्चा भी खूब होती है। आमतौर पर डिटॉक्स का अर्थ शरीर से हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालने से लगाया जाता है। हालांकि, वैज्ञानिक रूप से शरीर की सफाई का काम मुख्य रूप से लिवर, किडनी, फेफड़े और पाचन तंत्र करते हैं। किसी खास डिटॉक्स प्रक्रिया से शरीर के सभी अंगों की गंदगी निकलने या गंभीर बीमारियां ठीक होने का दावा सही नहीं है।
गाजियाबाद के आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. कपिल त्यागी के बताए पारंपरिक उपायों में नेति-नस्य, धौती, ऑयल पुलिंग और कपालभाति शामिल हैं। आइए इनके बारे में जानते हैं।
1. नेति और नस्य क्रिया
आयुर्वेद और योग की परंपरा में नेति तथा नस्य को नाक और श्वसन मार्ग की देखभाल से जुड़ी प्रक्रियाओं के रूप में जाना जाता है।
नेति क्रिया: इसमें विशेष नेति पॉट की सहायता से एक नथुने में नमक मिला साफ पानी डाला जाता है, जो दूसरे नथुने से बाहर निकलता है। इससे नाक में जमा बलगम और धूल के कणों को साफ करने में मदद मिल सकती है।
नेति के लिए केवल स्टेराइल, डिस्टिल्ड या पहले उबालकर ठंडा किया हुआ पानी इस्तेमाल करना चाहिए। सीधे नल का पानी इस्तेमाल करना संक्रमण का गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। उपकरण को हर बार साफ और सूखा रखना भी जरूरी है।
नस्य क्रिया: इसमें नाक के रास्ते विशेष तेल या औषधीय पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद में इसे नासिका मार्ग की देखभाल से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, हर तरह का तेल नाक में डालना सुरक्षित नहीं होता। इसे चिकित्सक की सलाह और सही विधि से ही करना चाहिए।
2. धौती क्रिया
धौती योग की पारंपरिक शुद्धि प्रक्रियाओं में शामिल है। इसका उद्देश्य शरीर की आंतरिक सफाई से जोड़ा जाता है। इसके कुछ प्रकारों में गले, पेट और पाचन तंत्र से संबंधित विशेष अभ्यास शामिल होते हैं।
हालांकि, धौती की कुछ विधियों में पानी पीकर उल्टी करना या पेट की सफाई जैसी प्रक्रिया शामिल हो सकती है। गलत तरीके से अभ्यास करने पर पानी-नमक का संतुलन बिगड़ने, गले और भोजन नली में चोट, उल्टी या अन्य जटिलताओं का खतरा हो सकता है।
इसलिए धौती क्रिया को घर पर खुद से आजमाना उचित नहीं है। गर्भवती महिलाओं, बच्चों और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। किसी भी अभ्यास से पहले योग्य विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।

3. ऑयल पुलिंग
ऑयल पुलिंग आयुर्वेद की पारंपरिक मौखिक स्वच्छता पद्धति है। इसमें तिल या नारियल जैसे खाद्य तेल को कुछ समय तक मुंह में घुमाया जाता है और फिर थूक दिया जाता है।
इस प्रक्रिया को मसूड़ों और दांतों की देखभाल से जोड़ा जाता है। कुछ सीमित अध्ययनों में इससे मुंह के बैक्टीरिया और सांस की दुर्गंध में कमी के संकेत मिले हैं, लेकिन दांतों की सफेदी, मसूड़ों की बीमारी या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज के लिए इसके पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं।
ऑयल पुलिंग को ब्रश और फ्लॉसिंग का विकल्प नहीं बनाना चाहिए। तेल को निगलने से बचें और प्रक्रिया के बाद मुंह को अच्छी तरह साफ करें। दांतों या मसूड़ों में परेशानी होने पर दंत चिकित्सक से संपर्क करें।
4. कपालभाति प्राणायाम
कपालभाति योग की एक प्रसिद्ध श्वास तकनीक है। इसमें पेट की मांसपेशियों को सक्रिय करते हुए नाक से तेजी से सांस बाहर छोड़ी जाती है, जबकि सांस अंदर लेना अपेक्षाकृत सहज रहता है।
नियमित और सही तरीके से किए गए श्वास अभ्यास से कुछ लोगों को सांस पर नियंत्रण, एकाग्रता और मानसिक शांति में मदद मिल सकती है। हालांकि, कपालभाति को किडनी या फेफड़ों की सफाई, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग या हर्निया के इलाज के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं है।
हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, हर्निया, पेट की सर्जरी के बाद की स्थिति या गर्भावस्था में कपालभाति करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूरी है। चक्कर, दर्द या सांस लेने में परेशानी होने पर अभ्यास तुरंत रोक देना चाहिए।
शरीर को स्वस्थ रखने के लिए इन आदतों पर भी दें ध्यान
शरीर की प्राकृतिक सफाई व्यवस्था को बेहतर ढंग से काम करने में मदद के लिए रोजमर्रा की कुछ आदतें महत्वपूर्ण हैं:
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पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं और शरीर को हाइड्रेटेड रखें।
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भोजन में फल, सब्जियां, साबुत अनाज और फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ शामिल करें।
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नियमित शारीरिक गतिविधि और व्यायाम करें।
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पर्याप्त नींद लें और तनाव को नियंत्रित रखने की कोशिश करें।
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धूम्रपान और अत्यधिक शराब के सेवन से बचें।
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बिना चिकित्सकीय सलाह के डिटॉक्स ड्रिंक, उपवास या कठोर शुद्धि प्रक्रियाएं न अपनाएं।
आयुर्वेद की पारंपरिक क्रियाएं कुछ लोगों के लिए उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन इन्हें सभी बीमारियों का इलाज या शरीर के हर अंग की सफाई का प्रमाणित तरीका नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी नई प्रक्रिया को अपनाने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार योग्य चिकित्सक से सलाह जरूर लें।



