इन 3 स्थितियों में छाछ पीना हो सकता है नुकसानदेह
1. किडनी (वृक्क) से जुड़ी बीमारियाँ
किडनी के मरीजों के लिए आहार का संतुलन बहुत जरूरी होता है। छाछ में पोटैशियम और फास्फोरस की मात्रा अधिक होती है। यदि किडनी सही से काम नहीं कर रही है, तो वह रक्त से अतिरिक्त फास्फोरस और पोटैशियम को बाहर नहीं निकाल पाती, जिससे शरीर में इनका स्तर खतरनाक रूप से बढ़ सकता है। इसलिए, डायलिसिस या क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) के मरीजों को डॉक्टर की सलाह के बिना छाछ नहीं लेनी चाहिए।
2. सर्दी, खांसी और जुकाम (ठंडी तासीर)
आयुर्वेद के अनुसार, छाछ की तासीर 'शीतल' (ठंडी) होती है। यदि आप पहले से ही कफ, गले में खराश, टॉन्सिल या बुखार से पीड़ित हैं, तो छाछ का सेवन संक्रमण को बढ़ा सकता है। विशेष रूप से रात के समय छाछ पीना कफ दोष को बढ़ाता है, जिससे फेफड़ों में जकड़न महसूस हो सकती है।
3. लैक्टोज इनटॉलरेंस (Lactose Intolerance)
चूंकि छाछ डेयरी उत्पाद (दूध) से बनती है, इसमें लैक्टोज की मौजूदगी होती है। जिन लोगों का शरीर लैक्टोज को पचा नहीं पाता, उन्हें छाछ पीने से पेट फूलना (Bloating), गैस, दस्त या पेट में ऐंठन की समस्या हो सकती है। हालांकि, दही बनने की प्रक्रिया में कुछ लैक्टोज लैक्टिक एसिड में बदल जाता है, फिर भी संवेदनशील लोगों के लिए यह जोखिम भरा हो सकता है।
छाछ पीते समय इन 3 बातों का रखें ध्यान
यदि आप स्वस्थ हैं और छाछ का आनंद लेना चाहते हैं, तो इन सुझावों को अपनाएं:
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समय का चुनाव: छाछ पीने का सबसे सही समय दोपहर का भोजन (Lunch) है। सूर्यास्त के बाद या रात को छाछ पीने से बचना चाहिए, क्योंकि यह कफ बना सकती है।
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मसालों का प्रयोग: छाछ को और अधिक पाचक बनाने के लिए इसमें भुना हुआ जीरा, काला नमक, हींग और पुदीना जरूर मिलाएं। यह इसके ठंडे प्रभाव को संतुलित करता है।
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ताजगी: हमेशा ताजी छाछ पिएं। बहुत ज्यादा खट्टी या पुरानी छाछ पित्त दोष को बढ़ा सकती है और गले में संक्रमण का कारण बन सकती है।
