क्षमापना दिवस विशेष : पृथ्वी, जल, वायु और आकाश की भांति अनंत है क्षमा का भाव
(संदीप सृजन – विनायक फीचर्स) भारतीय अध्यात्म की परंपरा में जैन और वैदिक दर्शन को उसके दो प्रमुख स्तंभ माना जाता है। इन दोनों में ही क्षमा को आत्म-उन्नति और आत्म-शुद्धि का महत्वपूर्ण माध्यम बताया गया है। जैन परंपरा में क्षमा को अहिंसा का विस्तार माना गया है, वहीं वैदिक दर्शन इसे धर्म और मोक्ष की आधारशिला बताता है। क्षमा न केवल क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध की जंजीरों को तोड़ती है, बल्कि मनुष्य को उसकी दिव्य चेतना से भी जोड़ती है। यही कारण है कि क्षमा कमजोरी नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
जैन दर्शन में क्षमा का महत्व
जैन धर्म अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांतवाद पर आधारित है। इसमें क्षमा को क्षांति कहा गया है, जिसका अर्थ है सहनशीलता और दया। जैन मान्यता के अनुसार, क्रोध और द्वेष जैसे विकार नए कर्मों को आकर्षित करते हैं, जो आत्मा को जन्म-मरण के चक्र में बांधते हैं। क्षमा का अभ्यास इन विकारों को नष्ट कर आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाता है।
महावीर स्वामी के जीवन से उदाहरण मिलता है कि उन्होंने कभी प्रतिशोध का मार्ग नहीं अपनाया। यहां तक कि जब एक सर्प ने उन्हें डसा, तब भी उन्होंने शांत भाव से क्षमा का उच्चारण किया। जैन साहित्य में प्रतिक्रमण अनुष्ठान इसी क्षमा भावना का अभ्यास है, जिसमें व्यक्ति अपने दोषों के लिए क्षमा मांगता है।
जैन दर्शन क्षमा को चार रूपों में देखता है –
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क्रोध न करना
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क्रोध को नियंत्रित करना
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अपराधी को क्षमा करना
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स्वयं को क्षमा करना
इन्हीं गुणों के कारण क्षमा सामाजिक सद्भाव और शांति का मार्ग बनती है।
वैदिक दर्शन में क्षमा का स्वरूप
वेद, उपनिषद और स्मृतियां क्षमा को तितिक्षा के रूप में प्रस्तुत करती हैं। ऋग्वेद में कहा गया है –
"क्षमां भूमि: क्षमां जलं, क्षमां वायु: क्षमां आकाशं"
अर्थात क्षमा पृथ्वी, जल, वायु और आकाश की तरह असीम है।
वैदिक दृष्टि से मनुष्य ब्रह्म का अंश है, लेकिन अज्ञान के कारण वह बंधन में है। क्षमा इन आवरणों को हटाकर आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है। मनुस्मृति में क्षमा को धर्म का मूल बताया गया है, वहीं उपनिषदों में इसे तपस्या का रूप माना गया है। कर्मयोग की व्याख्या में भी क्षमा महत्वपूर्ण है – जब व्यक्ति बिना फल की अपेक्षा कर्म करता है और क्षमा भाव अपनाता है, तब वह अहंकार से मुक्त होकर ब्रह्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है।
समान धारा, समान संदेश
जैन और वैदिक दोनों परंपराएं यह संदेश देती हैं कि क्षमा ही आत्म-शुद्धि और मोक्ष का मार्ग है। जैन मत में यह अहिंसा की परिणति है, वहीं वैदिक मत में यह धर्म और अध्यात्म का सार है।
आज के संघर्षपूर्ण विश्व में क्षमा का अभ्यास सामाजिक समरसता और वैश्विक शांति की दिशा में सबसे प्रभावी उपाय हो सकता है। क्षमा अपनाकर ही हम अपने भीतर देवत्व स्थापित कर सकते हैं और एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं। अतः इस क्षमापना दिवस पर हम सबको यह संकल्प लेना चाहिए कि – क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध को त्यागकर क्षमा को अपनाएं और जीवन को दिव्यता की ओर ले जाएं।

