Yoga Day 2026: "मन और प्राण को एकाकार करने वाली साधना ही हठयोग है"; बलरामपुर में महर्षि पतंजलि और नाथ योगियों के योगदान पर राष्ट्रीय व्याख्यानमाला आयोजित

Yoga Day 2026: "Hatha Yoga is the practice that unites the mind and the vital force (Prana)"; a national lecture series on the contributions of Maharshi Patanjali and the Nath Yogis was organized in Balrampur.
 
huiu

बलरामपुर (18 जून 2026):  अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के उपलक्ष्य में देवीपाटन मंडल की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना को एक नई दिशा देने का अभिनव प्रयास शुरू हुआ है। मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय, बलरामपुर एवं सामाजिक संस्था 'बलरामपुर फर्स्ट' के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित साप्ताहिक राष्ट्रीय योग व्याख्यानमाला के अंतर्गत बुधवार को एक महत्वपूर्ण वर्चुअल एवं भौतिक व्याख्यान का आयोजन किया गया।

इस राष्ट्रीय वेबिनार का मुख्य विषय “योग के विकास में महर्षि पतंजलि और नाथ योगियों का योगदान” रखा गया था, जिसमें देश-विदेश के सैकड़ों शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और योग साधकों ने उत्साहपूर्वक अपनी सहभागिता दर्ज कराई।

"योग के 80% अभ्यासों में नाथ संप्रदाय का योगदान" — डॉ. उमाशंकर कौशिक

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में मुंबई के सुप्रसिद्ध सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. उमाशंकर कौशिक ने शिरकत की। उन्होंने भारतीय योग परंपरा, दर्शन और हठयोग के विविध गूढ़ आयामों पर सविस्तार प्रकाश डाला।

डॉ. कौशिक ने ऐतिहासिक तथ्यों को रेखांकित करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण बात साझा की। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में दुनिया भर में प्रचलित योग की प्रमुख शारीरिक और मानसिक साधना-पद्धतियों में नाथ योगियों का योगदान अतुलनीय है। आज के समय में उपयोग किए जाने वाले योग के लगभग 40 प्रमुख अभ्यासों (आसनों और क्रियाओं) में से 80 प्रतिशत से अधिक योगदान अकेले नाथ संप्रदाय की साधना परंपरा का है। यह आंकड़ा प्रमाणित करता है कि भारतीय योग विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने में नाथ योगियों ने कितनी केंद्रीय और ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।

क्या है हठयोग का वास्तविक अर्थ?

डॉ. उमाशंकर कौशिक ने अपने व्याख्यान में हठयोग की वैज्ञानिक और आध्यात्मिक परिभाषा को स्पष्ट करते हुए कहा:हठयोग केवल शारीरिक कसरत या अंग-संचालन नहीं है, बल्कि यह मन, प्राण और चेतना के अद्भुत समन्वय की एक आंतरिक साधना है। हठयोग में 'ह' का अर्थ सूर्य और 'ठ' का अर्थ चंद्र है। इसी प्रकार यह प्राण और अपान, तथा चेतना और शक्ति के प्रतीक हैं। शरीर के भीतर मौजूद इन दोनों विपरीत ऊर्जाओं को संतुलित करना, उनमें समन्वय स्थापित करना और मन-प्राण को एकाकार कर देना ही हठयोग का मूल उद्देश्य है, जो साधक को समाधि की उच्चतर अवस्था तक ले जाता है।"

उन्होंने आगे कहा कि महायोगी गुरु गोरक्षनाथ और अन्य नाथ योगियों ने महर्षि पतंजलि के क्लिष्ट योग-दर्शन (Yoga Philosophy) को जनसाधारण के लिए बेहद सहज, व्यावहारिक और लोककल्याणकारी बनाया, जिससे योग महलों और कंदराओं से निकलकर जन-जन की जीवन पद्धति बन सका।

देवीपाटन मंडल की सांस्कृतिक चेतना को मिलेगी नई दिशा

कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रवि शंकर सिंह ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. सिंह ने महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग और नाथपंथ के हठयोग का एक बेहतरीन तुलनात्मक व प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

कुलपति प्रो. रवि शंकर सिंह ने कहा कि मां पाटेश्वरी की यह पावन धरती प्राचीन काल से ही अध्यात्म का केंद्र रही है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर आयोजित यह व्याख्यानमाला इस पूरे क्षेत्र की जनता को योग, उत्तम स्वास्थ्य और मानसिक शांति के प्रति जागरूक करने में एक मील का पत्थर साबित होगी।

सांस्कृतिक धरोहर को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प

कार्यक्रम के समापन पर 'बलरामपुर फर्स्ट' संस्था के संस्थापक सर्वेश सिंह ने सभी वक्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने संकल्प दोहराया कि योग भारतीय संस्कृति की एक अमूल्य और वैश्विक धरोहर है, और इसे समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस वैचारिक गोष्ठी का कुशल संचालन डॉ. बी.एल. गुप्ता ने किया। कार्यक्रम के दौरान योग के दार्शनिक और व्यावहारिक पक्षों पर हुई सारगर्भित चर्चा ने सभी जिज्ञासुओं को भारतीय योग की समृद्ध विरासत से गहराई से परिचित कराया।

Tags