स्वच्छ शहर इंदौर में दूषित पानी से 15 मौतें
15 deaths due to contaminated water in clean city Indore
Sat, 3 Jan 2026
(पवन वर्मा – विनायक फीचर्स)
इंदौर में 15 लोगों की मौत किसी अचानक हुई दुर्घटना या कोरोना जैसी महामारी का परिणाम नहीं है। ये मौतें धीरे-धीरे आईं—चेतावनियों के बीच आईं—और उस चुप्पी की कोख से पैदा हुईं, जिसमें आम लोगों की शिकायतें दफन कर दी गईं। जिन नलों से हर सुबह जीवन बहना चाहिए था, उन्हीं नलों से ज़हर आता रहा। लोगों ने बदबूदार, गंदे पानी की शिकायतें कीं, बीमारी की आशंका जताई, लेकिन नगर निगम ने सुनने के बजाय उन्हें दबाना चुना। यहीं प्रशासनिक लापरवाही, प्रशासनिक विश्वासघात में बदल गई।

यह त्रासदी इसलिए और पीड़ादायक है क्योंकि इसे रोका जा सकता था। यदि शिकायतों को समय रहते गंभीरता से लिया गया होता, यदि चेतावनियों को असुविधा नहीं बल्कि खतरे का संकेत समझा गया होता, तो आज 15 घरों में सन्नाटा न पसरा होता। ये मौतें और एक हजार से अधिक बीमार लोग केवल व्यवस्था की विफलता नहीं हैं, बल्कि उस भरोसे का टूटना हैं, जो आम नागरिक अपने प्रशासन पर करता है। जब जनता चेतावनी देती है और व्यवस्था चुप्पी ओढ़ लेती है, तब जिम्मेदारी टलती नहीं—जानलेवा बन जाती है।
इंदौर की यह घटना स्वच्छता के उन तमाम दावों पर सवाल खड़े करती है, जिनमें चमक तो बहुत है, लेकिन संवेदना नहीं।मेरा यह लेख भी उसी मूल प्रश्न से शुरू होता है—यदि पानी दूषित था और शिकायतें पहले से मौजूद थीं, तो इस प्रशासनिक विश्वासघात की कीमत आम लोगों कोअपनी जान देकर क्यों चुकानी पड़ी?
अब यह तथ्य सामने आ चुका है कि दूषित जलापूर्ति को लेकर स्थानीय नागरिकों ने बार-बार नगर निगम से शिकायत की थी। बदबू, रंग बदलने और बीमारी फैलने की आशंका तक जाहिर की गई थी। इसके बावजूद न शिकायतों को गंभीरता से लिया गया, न कोई सार्वजनिक चेतावनी जारी की गई। उलटे, उन्हें दबाने का प्रयास किया गया ताकि शहर की ‘स्वच्छ’ छवि पर आंच न आए। यहीं यह मामला सामान्य प्रशासनिक चूक से आगे बढ़कर संस्थागत संवेदनहीनता का रूप ले लेता है।
यह घटना एक कड़वा सच भी उजागर करती है—कि नगर निगम, जिला प्रशासन और सरकारी दफ्तरों में आमजन की शिकायतों को समाधान की मांग नहीं, बल्कि फाइलों का बोझ माना जाता है। नागरिक की आवाज़ को सिस्टम की असुविधा समझा जाता है। इंदौर की त्रासदी बताती है कि यह सोच अब केवल प्रशासनिक अहंकार नहीं, बल्कि जानलेवा मानसिकता बन चुकी है।
स्वच्छता के राष्ट्रीय पुरस्कारों और रैंकिंग ने इंदौर को पहचान दी, लेकिन उसी पहचान ने प्रशासन को आत्ममुग्ध भी कर दिया। स्वच्छता को निरंतर जांच की प्रक्रिया नहीं, बल्कि स्थायी उपलब्धि मान लिया गया। यही भ्रम सबसे घातक साबित हुआ। जब किसी शहर को आदर्श मान लिया जाता है, तब उसकी खामियों पर सवाल उठाने वालों को या तो अनदेखा किया जाता है या खामोश कर दिया जाता है। इंदौर में शिकायतों के साथ यही हुआ।
पानी एक दिन में जहरीला नहीं होता। वह धीरे-धीरे खराब होता है और संकेत देता रहता है। जब लोग लगातार शिकायत कर रहे हों, तो वह केवल असुविधा नहीं, बल्कि चेतावनी होती है। इंदौर में यह चेतावनी बार-बार दी गई, लेकिन प्रशासन ने उसे स्वीकार करने के बजाय दबाने का रास्ता चुना—और यहीं से यह त्रासदी टलने योग्य नहीं रही।
घटना के बाद सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए कुछ कड़े कदम उठाए। इंदौर नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव को पद से हटाया गया। अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया और पिछले 13 वर्षों से जल वितरण व्यवस्था संभाल रहे प्रभारी अधीक्षण यंत्री संजीव श्रीवास्तव को निलंबित किया गया। ये कदम जवाबदेही की कोशिश जरूर दिखाते हैं, लेकिन यह भी सच है कि यह कार्रवाई मौतों के बाद हुई, शिकायतों के समय नहीं।
सरकार ने इस मामले को केवल इंदौर तक सीमित न मानते हुए पूरे प्रदेश के लिए चेतावनी के रूप में लिया है। नगरीय प्रशासन विभाग ने मध्यप्रदेश के सभी 16 नगर निगमों सहित 413 नगरीय निकायों को सात दिनों में पाइपलाइन रिसाव की जांच और पानी की गुणवत्ता परीक्षण के निर्देश दिए हैं। यह आदेश स्वयं इस बात की स्वीकारोक्ति है कि समस्या प्रणालीगत है।
इस घटना ने राजनीतिक माहौल भी गरमा दिया। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि इंदौर में लोगों को पानी नहीं, ज़हर पिलाया गया और प्रशासन कुंभकर्णी नींद में रहा। बयान राजनीतिक हो सकता है, लेकिन सवाल जनता के भरोसे से जुड़ा है—और उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
मामला अब न्यायिक दायरे में भी पहुंच चुका है। इंदौर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है, जिसे हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रितेश ईनाणी ने प्रस्तुत किया है। अदालत की निगरानी से उम्मीद जगी है कि यह मामला केवल निलंबन और स्थानांतरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शिकायतें दबाने की जिम्मेदारी भी तय होगी।
असल सवाल अब यह नहीं है कि किसे हटाया गया या किसे निलंबित किया गया। असली सवाल यह है कि शिकायतों को दबाने की मानसिकता कैसे बनी और उसे संरक्षण किस स्तर पर मिला। जब तक इस सोच पर सीधा प्रहार नहीं होगा, हर कार्रवाई अधूरी ही मानी जाएगी।
इंदौर की यह त्रासदी एक कड़ी चेतावनी है।
स्वच्छता का अर्थ केवल साफ दिखना नहीं, बल्कि सुरक्षित होना है।
जब व्यवस्था आमजन की आवाज़ को बाधा मानने लगे, तब खतरा सिर्फ पानी में नहीं, पूरे सिस्टम में फैल जाता है।
यदि इस घटना से भी यह सबक नहीं लिया गया कि शिकायतें लोकतंत्र की सबसे अहम चेतावनी होती हैं, तो अगली बार चेतावनी देने वाला कोई बचेगा ही नहीं—और तब न जवाबदेही बचेगी, न विश्वास; बचेगें तो सिर्फ पछतावे के आँसू।
