हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष ‘सत्य’ और ‘जनसरोकार’ की तलाश में पत्रकारिता
200 Years of Hindi Journalism Journalism in Search of 'Truth' and 'Public Concern'
Thu, 26 Mar 2026
विवेक रंजन श्रीवास्तव — विनायक फीचर्स)
भारतीय वांग्मय के पौराणिक संदर्भों को देखें तो देवर्षि नारद संभवतः सृष्टि के प्रथम पत्रकार कहे जा सकते हैं, जो लोकमंगल के लिए सूचनाओं का आदान-प्रदान करते थे। इसी क्रम में कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि से संजय द्वारा धृतराष्ट्र को सुनाया गया आँखों देखा हाल ‘लाइव रिपोर्टिंग’ का अद्भुत उदाहरण है।
आधुनिक विश्व में पत्रकारिता का बीज 131 ईसा पूर्व रोम के ‘एक्टा डियुर्ना’ (Acta Diurna) में मिलता है, जहाँ प्रस्तर पट्टियों पर सूचनाएँ अंकित कर सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित की जाती थीं। 15वीं शताब्दी में योहन गुटेनबर्ग द्वारा मुद्रण यंत्र (प्रिंटिंग प्रेस) के आविष्कार ने सूचना क्रांति को गति दी और 1605 में विश्व का पहला मुद्रित समाचार पत्र ‘रिलेशन’ अस्तित्व में आया।

हिंदी पत्रकारिता का विधिवत प्रारंभ 30 मई 1826 को हुआ, जब पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता से ‘उदंत मार्तंड’ (उगता हुआ सूरज) का प्रकाशन शुरू किया। यद्यपि भाषायी चुनौतियों और डाक व्यय के कारण यह पत्र मात्र छह माह ही चल सका, किंतु इसने हिंदी पत्रकारिता की वह मशाल जलाई, जिसे आगे चलकर समाज सुधारकों ने आगे बढ़ाया। 1850 के दशक तक प्रेस नियमों में ढील मिलने से हिंदी पत्र-पत्रिकाओं ने अपनी जड़ें मजबूत करनी शुरू कर दीं।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ने पत्रकारिता के चरित्र को ‘सूचना’ से ‘विद्रोह’ में बदल दिया। इस दौर में पत्रकारों ने अपनी कलम को हथियार बनाया। 20वीं सदी के प्रारंभ में जब स्वतंत्रता आंदोलन तेज हुआ, तब पत्रकारिता एक ‘मिशन’ बन गई।
इस कालखंड में महात्मा गांधी का योगदान हिंदी पत्रकारिता के लिए स्वर्ण युग सिद्ध हुआ। उन्होंने ‘इंडियन ओपिनियन’, ‘नवजीवन’ और ‘हरिजन’ जैसे पत्रों के माध्यम से पत्रकारिता को समाज सेवा और नैतिकता का माध्यम बनाया। गांधीजी का मानना था कि “पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य सेवा होना चाहिए।” उनके संपादन में पत्रकारिता केवल समाचार नहीं, बल्कि समाज सुधार और अहिंसक प्रतिरोध का सशक्त माध्यम बन गई।
स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिलने से पत्रकारिता का विस्तार महानगरों से कस्बों और गाँवों तक हुआ। यह दौर पत्रकारिता के साहित्यिक उत्कर्ष का भी था, जिसमें अज्ञेय, धर्मवीर भारती और रघुवीर सहाय जैसे साहित्यकारों ने ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से इसे नई ऊँचाइयाँ दीं।
1975 का आपातकाल पत्रकारिता के इतिहास का कठिन दौर रहा, जब प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगे। इसके बावजूद भूमिगत पत्रों ने लोकतंत्र की लौ को बुझने नहीं दिया।
1990 के दशक में उदारीकरण के साथ पत्रकारिता ‘मिशन’ से ‘प्रोफेशन’ और फिर ‘बाजार’ की ओर बढ़ी। निजी समाचार चैनलों के उदय ने ‘ब्रेकिंग न्यूज’ की संस्कृति को जन्म दिया। प्रिंट मीडिया अधिक आकर्षक और बहुआयामी हुआ, लेकिन ‘पेड न्यूज’ जैसी चुनौतियाँ भी सामने आईं।
21वीं सदी का दूसरा दशक ‘डिजिटल संक्रमण’ का रहा। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने हर नागरिक को ‘सिटीजन जर्नलिस्ट’ बना दिया। आज हिंदी पत्रकारिता सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में प्रवेश कर चुकी है। जहाँ एक ओर सूचनाएँ क्षण भर में वैश्विक हो रही हैं, वहीं ‘फेक न्यूज’ और ‘प्रेस फ्रीडम’ जैसी चुनौतियाँ भी गंभीर रूप में सामने हैं।
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की यह यात्रा ‘उदंत मार्तंड’ की स्याही से लेकर आज के डिजिटल पिक्सल तक का विकासक्रम है। माध्यम बदल गए—पत्थर से कागज और कागज से स्क्रीन तक—परंतु पत्रकारिता की आत्मा आज भी ‘सत्य’ और ‘जनसरोकार’ की खोज में ही है। यही वह मूल भावना है, जिसका सपना पंडित जुगल किशोर शुक्ल और महात्मा गांधी ने देखा था।
आने वाला समय तकनीक और नैतिकता के संतुलन का होगा—और यही हिंदी पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती और अवसर दोनों है।
