मोदी जी के 25 वर्ष: भारत के आत्मविश्वास और नवचेतना के उदय का काल

वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका, युवाओं में नवाचार की प्रेरणा, भारतीय संस्कृति का प्रसार और आत्मनिर्भरता की आकांक्षा ने बदली देश की पहचान

 
मोदी जी के 25 वर्ष: भारत के आत्मविश्वास और नवचेतना के उदय का काल

लेखक हरीश श्रीवास्तव वरिष्ठ भाजपा नेता :  भारत की राजनीति में कुछ कालखंड ऐसे होते हैं, जिनका मूल्यांकन केवल सत्ता में बिताए गए वर्षों से नहीं, बल्कि देश की दिशा, समाज की सोच और वैश्विक पहचान पर पड़े उनके प्रभाव से किया जाता है। नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक नेतृत्व के 25 वर्षों का यह पड़ाव भी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अक्टूबर 2001 में शुरू हुई उनकी शासन यात्रा मई 2014 में देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ी। इस अवधि को भारत के आत्मविश्वास, राष्ट्रीय आकांक्षाओं और वैश्विक भूमिका में आए बदलावों के संदर्भ में देखा जा सकता है।

एक राजनीतिक विश्लेषक की दृष्टि से इस कालखंड की कई विशेषताएं ध्यान आकर्षित करती हैं। इनमें वैश्विक मंचों पर भारत की सक्रियता, राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सख्त रुख, युवाओं में उद्यमिता को प्रोत्साहन, भारतीय संस्कृति का अंतरराष्ट्रीय प्रसार और आम नागरिकों की उपलब्धियों को राष्ट्रीय पहचान देने का प्रयास प्रमुख हैं।

वैश्विक मंच पर भारत का आत्मविश्वास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति और वैश्विक कूटनीति को व्यापक सार्वजनिक चर्चा मिली है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत ने अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं, आर्थिक हितों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को प्रमुखता से उठाया है। विभिन्न देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने और बदलती वैश्विक परिस्थितियों में अपने हितों की रक्षा करने का प्रयास इस अवधि की महत्वपूर्ण विशेषताओं में शामिल रहा है।

संकट के समय भारतीय नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने के अभियान, कोविड-19 महामारी के दौरान राहत एवं स्वास्थ्य संबंधी प्रयास और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई ने भारत की प्रशासनिक तथा रणनीतिक क्षमताओं को चर्चा के केंद्र में रखा। बालाकोट एयरस्ट्राइक जैसी कार्रवाइयों को सरकार ने आतंकवाद के विरुद्ध भारत के दृढ़ रुख के रूप में प्रस्तुत किया। इन घटनाओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की जवाबी कार्रवाई की क्षमता को लेकर सार्वजनिक विमर्श को भी प्रभावित किया।

हालांकि, भारत की वैश्विक स्थिति में बदलाव का आकलन करते समय कूटनीति, आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता, व्यापार, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों जैसे कई पहलुओं को साथ रखकर देखना जरूरी है। यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत का आत्मविश्वास किसी एक नेता या कालखंड की देन नहीं, बल्कि दशकों से विकसित होती राष्ट्रीय क्षमताओं और संस्थागत प्रयासों का परिणाम है।

प्रवासी भारतीयों के माध्यम से बढ़ी देश की वैश्विक उपस्थिति

प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं और विभिन्न देशों में भारतीय समुदायों के साथ उनके संवाद ने प्रवासी भारतीयों को राष्ट्रीय विमर्श में प्रमुख स्थान दिया है। विदेशों में आयोजित भारतीय समुदाय के कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी ने भारतवंशियों के सांस्कृतिक जुड़ाव और देश के प्रति भावनात्मक संबंधों को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त करने का अवसर दिया।

दुनिया के अनेक देशों में रहने वाले भारतीय पेशेवर, उद्यमी, वैज्ञानिक, चिकित्सक और अन्य विशेषज्ञ अपने कार्यों के माध्यम से भारत की छवि को मजबूत करते हैं। एक मर्चेंट नेवी कैप्टन, जिन्होंने लगभग 122 देशों की यात्रा की है, के साथ बातचीत में सामने आया अनुभव भी इस भावना को रेखांकित करता है कि विदेशों में भारत की पहचान और उसके नागरिकों के प्रति सम्मान महत्वपूर्ण विषय हैं।

हालांकि, किसी देश के नागरिकों को विदेश में मिलने वाला व्यवहार अनेक कारकों से प्रभावित होता है। फिर भी, प्रवासी भारतीयों की उपलब्धियों और भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय सक्रियता ने देश की वैश्विक उपस्थिति को व्यापक पहचान दिलाने में योगदान दिया है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर दृढ़ता

भारत ने पहले भी विभिन्न प्रधानमंत्रियों के नेतृत्व में राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मामलों पर निर्णायक कदम उठाए हैं। लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भी देश ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया और अपनी सामरिक क्षमता का परिचय दिया।

मोदी सरकार के कार्यकाल में बालाकोट एयरस्ट्राइक और आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाइयों ने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सरकार के दृष्टिकोण को रेखांकित किया। इन कदमों को समर्थकों ने भारत की जवाबी कार्रवाई की क्षमता और दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक माना। वहीं, ऐसी कार्रवाइयों का व्यापक मूल्यांकन करते समय उनके रणनीतिक परिणामों, क्षेत्रीय स्थिरता और दीर्घकालीन सुरक्षा प्रभावों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

स्टार्टअप और नवाचार से युवाओं को नए अवसर

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में स्टार्टअप, डिजिटल तकनीक और नवाचार को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया है। स्टार्टअप इंडिया जैसी पहलों, डिजिटल सेवाओं के विस्तार और उद्यमिता को प्रोत्साहन देने वाले कार्यक्रमों ने युवाओं के बीच अपना कारोबार शुरू करने तथा नई तकनीकों पर काम करने की संभावनाओं को बढ़ाया है।

देश में स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार आर्थिक गतिविधियों, तकनीकी प्रयोगों और रोजगार सृजन के नए अवसरों से जुड़ा है। अनेक युवा उद्यमी शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, वित्तीय सेवाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे क्षेत्रों में नए समाधान विकसित कर रहे हैं।

हालांकि, स्टार्टअप की संख्या बढ़ने के साथ उनकी दीर्घकालीन सफलता, वित्तपोषण, गुणवत्तापूर्ण रोजगार और कारोबार की स्थिरता जैसे मुद्दों पर भी ध्यान देना जरूरी है। इसके बावजूद नवाचार को युवाओं की आकांक्षाओं और आर्थिक विकास से जोड़ना इस कालखंड की उल्लेखनीय प्राथमिकताओं में शामिल रहा है।

‘मन की बात’ से सामान्य नागरिकों की उपलब्धियों को पहचान

प्रधानमंत्री के रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ ने देश के विभिन्न हिस्सों में काम कर रहे ऐसे लोगों और समूहों को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने का मंच प्रदान किया, जिनकी उपलब्धियां अक्सर व्यापक सार्वजनिक चर्चा तक नहीं पहुंच पाती थीं।

स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय उत्पादों, सामाजिक सेवा, शिक्षा, नवाचार और सामुदायिक प्रयासों से जुड़ी कहानियों के माध्यम से आम नागरिकों के योगदान को रेखांकित किया गया। इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि राष्ट्रीय विमर्श में केवल बड़े संस्थानों और प्रसिद्ध व्यक्तियों के बजाय स्थानीय स्तर पर बदलाव लाने वाले लोगों की कहानियों को भी स्थान मिला।

ऐसे प्रयासों से समाज के विभिन्न वर्गों में प्रेरणा और सहभागिता को बढ़ावा देने की संभावना बनी। साथ ही, किसी भी सार्वजनिक संवाद कार्यक्रम की तरह इसका मूल्यांकन भी इसकी पहुंच, नागरिकों की भागीदारी और जमीनी स्तर पर हुए वास्तविक बदलावों के आधार पर किया जाना चाहिए।

भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा को वैश्विक मंच

प्रधानमंत्री मोदी के सार्वजनिक नेतृत्व की एक विशिष्ट विशेषता भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत की खुली अभिव्यक्ति रही है। सार्वजनिक जीवन में धार्मिक प्रतीकों, मंदिरों के दर्शन और सांस्कृतिक परंपराओं को स्थान देने के उनके तरीके ने राजनीतिक तथा सामाजिक विमर्श में इस विषय को प्रमुखता दी है।

उनके समर्थकों का मानना है कि इससे भारतीय सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक दृश्यता मिली है। इसके साथ ही, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के साथ सभी समुदायों के प्रति सम्मान और संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रसार केवल धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं है। योग, आयुर्वेद, भारतीय कला, संगीत, साहित्य, भोजन और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां भी देश की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। इस संदर्भ में योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने के प्रयास विशेष महत्व रखते हैं।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से भारतीय परंपरा को मिली पहचान

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 2014 में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव स्वीकार किया और 2015 में पहली बार यह दिवस व्यापक रूप से मनाया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने योग को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र में पहल की थी।

योग दिवस ने भारतीय योग परंपरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने, योग प्रशिक्षकों के लिए नए अवसर पैदा करने और स्वास्थ्य एवं जीवनशैली से जुड़े विषयों पर वैश्विक संवाद को बढ़ाने में भूमिका निभाई। आज अनेक देशों में योग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और विभिन्न समुदाय इसे शारीरिक अभ्यास के साथ मानसिक संतुलन तथा जीवनशैली से जोड़कर देखते हैं।

पर्यटन और आध्यात्मिक विरासत पर बढ़ता ध्यान

भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता पर्यटन के क्षेत्र में बड़ी संभावनाएं रखती है। मोदी सरकार के दौरान धार्मिक स्थलों, तीर्थ क्षेत्रों और विरासत स्थलों के विकास तथा पर्यटन सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया गया है। इससे आध्यात्मिक पर्यटन को लेकर चर्चा और निवेश की संभावनाएं बढ़ी हैं।

काशी, अयोध्या, उज्जैन और अन्य प्रमुख धार्मिक केंद्रों के विकास ने तीर्थयात्रा, स्थानीय कारोबार और पर्यटन सेवाओं के विस्तार को लेकर नई अपेक्षाएं पैदा की हैं। इन पहलों का दीर्घकालीन प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करेगा कि पर्यटन सुविधाओं के विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय समुदायों के हित और ऐतिहासिक विरासत की रक्षा के बीच कितना संतुलन बनाया जाता है।

व्यक्तिगत अनुशासन और निरंतर सक्रियता

प्रधानमंत्री मोदी की सार्वजनिक छवि में व्यक्तिगत अनुशासन, नियमित दिनचर्या और निरंतर कार्यशीलता को विशेष स्थान मिला है। सार्वजनिक कार्यक्रमों, विदेश यात्राओं और राजनीतिक गतिविधियों में उनकी सक्रिय उपस्थिति समर्थकों के लिए प्रेरणा का विषय रही है।

व्रत-उपवास और व्यक्तिगत धार्मिक आस्थाओं का सार्वजनिक जीवन में पालन भी उनकी छवि का हिस्सा है। उनके समर्थक इसे दृढ़ संकल्प और आत्मसंयम से जोड़कर देखते हैं। वहीं, किसी भी नेतृत्व का व्यापक मूल्यांकन व्यक्तिगत जीवनशैली के साथ-साथ नीतियों, उनके परिणामों, संस्थागत व्यवस्था और नागरिकों के जीवन पर पड़े प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।

25 वर्षों की यात्रा का व्यापक अर्थ

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरुआत से लेकर देश के प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय नेतृत्व तक नरेंद्र मोदी की 25 वर्षों की सार्वजनिक यात्रा भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण अध्याय है। इस दौरान भारत की वैश्विक सक्रियता, डिजिटल परिवर्तन, उद्यमिता, सांस्कृतिक कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों ने विशेष स्थान प्राप्त किया है।

इस कालखंड की उपलब्धियों और चुनौतियों का संतुलित आकलन करने के लिए आर्थिक विकास, रोजगार, सामाजिक समावेशन, संस्थागत मजबूती, पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों के जीवन स्तर जैसे संकेतकों को भी साथ देखना होगा। राजनीतिक नेतृत्व की वास्तविक विरासत केवल उसकी लोकप्रियता या प्रतीकात्मक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि दीर्घकालीन परिणामों और देश की संस्थाओं पर उसके प्रभाव से भी तय होती है।

फिर भी, यह कहा जा सकता है कि मोदी के नेतृत्व के इन वर्षों ने भारत की राष्ट्रीय आकांक्षाओं, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और वैश्विक भूमिका को लेकर व्यापक बहस को नई दिशा दी है। आने वाले समय में इन पहलों के स्थायी परिणाम ही इस 25 वर्षीय यात्रा के ऐतिहासिक महत्व का अधिक स्पष्ट आकलन करने में मदद करेंगे।

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