पूरे शरीर में फैले गंभीर संक्रमण से जूझ रहे 6 वर्षीय बच्चे को मेदांता लखनऊ में मिला नया जीवन
वेंटिलेटर पर गंभीर हालत में पहुंचा था बच्चा
हिमांशु नामक छह वर्षीय बच्चे को गंभीर अवस्था में वेंटिलेटर सपोर्ट पर दूसरे अस्पताल से मेदांता लखनऊ के इमरजेंसी विभाग में रेफर किया गया। प्राथमिक उपचार के बाद उसे तत्काल पीआईसीयू में भर्ती किया गया, जहां विशेषज्ञों की टीम ने उसकी स्थिति की लगातार निगरानी करते हुए उपचार शुरू किया।
मामूली चोट से शुरू हुआ जानलेवा संक्रमण
डॉक्टरों के अनुसार, बीमारी की शुरुआत हाथ में लगी एक मामूली चोट से हुई थी। शुरुआती लक्षण निमोनिया के रूप में सामने आए, लेकिन संक्रमण तेजी से पूरे शरीर में फैल गया। इससे बच्चे को गंभीर निमोनिया, एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (ARDS), सेप्टिक शॉक और कई अंगों के प्रभावित होने जैसी जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ा।
कई अंग हुए प्रभावित
संक्रमण के कारण बच्चे में कई गंभीर चिकित्सीय जटिलताएं विकसित हो गईं, जिनमें शामिल थीं—
- सेप्टिक शॉक, जिसके लिए जीवनरक्षक दवाओं की आवश्यकता पड़ी।
- सबक्लेवियन नस में संक्रमित रक्त का थक्का बनना।
- फेफड़ों तक संक्रमित थक्कों का पहुंचना।
- हृदय में संक्रमण (इन्फेक्टिव एंडोकार्डाइटिस) और एओर्टिक रूट में फोड़ा।
- ह्यूमरस हड्डी में ऑस्टियोमायलाइटिस (हड्डी का संक्रमण)।
समय पर सर्जरी बनी जीवनरक्षक
दवाओं से अपेक्षित सुधार न मिलने पर पीआईसीयू टीम ने विस्तृत जांच कर संक्रमण के मुख्य स्रोत की पहचान की। पता चला कि नस में बना संक्रमित थक्का लगातार पूरे शरीर में संक्रमण फैला रहा था।
इसके बाद इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विशेषज्ञों ने सबक्लेवियन नस की थ्रॉम्बेक्टॉमी कर संक्रमित थक्के को हटाया। इस प्रक्रिया के 48 घंटे के भीतर बच्चे की हालत में उल्लेखनीय सुधार हुआ और जीवनरक्षक दवाएं बंद की जा सकीं।
बाद में ऑर्थोपेडिक टीम ने हड्डी में संक्रमण खत्म करने के लिए सर्जरी कर क्यूरेटेज और लैवेज की प्रक्रिया पूरी की।
छह सप्ताह चला इलाज
बच्चे को करीब चार सप्ताह तक वेंटिलेटर पर रखा गया और छह सप्ताह तक एंटीमाइक्रोबियल दवाएं दी गईं। उपचार पूरा होने के बाद किए गए पीईटी स्कैन और इकोकार्डियोग्राफी में संक्रमण पूरी तरह समाप्त होने की पुष्टि हुई।
विशेषज्ञों ने बताया सफलता का कारण
मेदांता लखनऊ के एसोसिएट डायरेक्टर एवं हेड, पीआईसीयू डॉ. अतहर जमाल ने कहा कि जटिल और जानलेवा बाल रोग स्थितियों में समय पर सही निर्णय, लगातार निगरानी और विभिन्न विशेषज्ञों के समन्वित प्रयास ही सफलता की कुंजी हैं। उन्होंने बताया कि अस्पताल में डीएम प्रशिक्षित पीडियाट्रिक इंटेंसिविस्ट की 24 घंटे उपलब्धता के कारण ऐसे गंभीर मामलों का प्रभावी इलाज संभव हो पाता है।
विशेषज्ञों की संयुक्त टीम ने निभाई अहम भूमिका
इस उपचार में पीआईसीयू टीम के साथ इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी, ऑर्थोपेडिक्स, पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी, पीडियाट्रिक एनेस्थीसियोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी और इंफेक्शियस डिजीज़ विभागों के विशेषज्ञों ने मिलकर कार्य किया।
यह मामला दर्शाता है कि गंभीर सेप्सिस और बहु-अंग संक्रमण जैसी स्थितियों में समय पर पहचान, उन्नत गहन चिकित्सा और विभिन्न विशेषज्ञों के समन्वित उपचार से जटिल मरीजों की जान बचाई जा सकती है।
