दावत-ए-सुख़न में सजी शायरी की महफ़िल, अदब और गंगा-जमुनी तहज़ीब का दिखा रंग

देशभर के नामचीन शायरों और कवियों ने रचनाओं से बांधा समां, साहित्य प्रेमियों ने उठाया लुत्फ
 
दावत-ए-सुख़न में सजी शायरी की महफ़िल, अदब और गंगा-जमुनी तहज़ीब का दिखा रंग

लखनऊ, 9 अगस्त 2026। लखनऊ की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत में शनिवार को एक और खूबसूरत अध्याय जुड़ गया, जब गोल्डन ब्लॉसम इम्पीरियल रिसॉर्ट्स में आयोजित ‘दावत-ए-सुख़न’ में देश के जाने-माने शायरों, कवियों और साहित्य प्रेमियों का जमावड़ा हुआ। ग़ज़ल, कविता, गीत, हास्य और व्यंग्य से सजी इस साहित्यिक शाम ने देर रात तक श्रोताओं को बांधे रखा।

कार्यक्रम का माहौल पूरी तरह अदबी रंग में रंगा नजर आया। मंच पर मौजूद रचनाकारों ने अपनी चुनिंदा रचनाओं और प्रस्तुतियों के माध्यम से श्रोताओं को कभी मुस्कुराने पर मजबूर किया तो कभी गंभीर भावनाओं से रूबरू कराया। साहित्य प्रेमियों ने भी पूरे उत्साह के साथ कवियों और शायरों की प्रस्तुतियों का आनंद लिया।

‘दावत-ए-सुख़न’ में आयोजित मुशायरे और कवि सम्मेलन में नदीम फर्रूख़, हसन काज़मी, वासिफ़ फ़ारूक़ी, शबीना अदीब, सर्वेश अस्थाना, जौहर कानपुरी, प्रियांशु गजेंद्र, हेमंत पांडे, शंभू शिखर, सोनरूपा, राम प्रसाद बेखुद और फ़ैज़ ख़ुमार सहित कई प्रतिष्ठित रचनाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से खूब वाहवाही बटोरी।

कार्यक्रम में शायरी और कविता के अलग-अलग रंग देखने को मिले। हास्य-व्यंग्य ने जहां श्रोताओं को गुदगुदाया, वहीं ग़ज़लों और गंभीर रचनाओं ने उन्हें भावनाओं की गहराई से जोड़ा। पूरी महफ़िल में अदब, तहज़ीब और साहित्य के प्रति लोगों का लगाव साफ दिखाई दिया।

आयोजक एवं ‘दावत-ए-सुख़न’ के साथ गोल्डन ब्लॉसम के हेड सेल्स एंड मार्केटिंग शादाब वारसी ने कहा कि यह आयोजन केवल कविता और शायरी तक सीमित नहीं है, बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की एक कोशिश है। उन्होंने कहा कि ऐसे मंचों के माध्यम से विभिन्न पीढ़ियों को साहित्य और अदब से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि लखनऊ की पहचान उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब, साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक विविधता से है। ‘दावत-ए-सुख़न’ जैसे आयोजन इसी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने साहित्य प्रेमियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी के लिए आभार जताते हुए भविष्य में भी इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करने की बात कही।

साहित्य और संस्कृति से जुड़े इस आयोजन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि शायरी और कविता केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने, संवेदनशील बनाने और साझा सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करने की प्रभावी अभिव्यक्ति भी हैं।

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