बंगाली संस्कृति का जीवंत प्रतीक: माँ दुर्गा को समर्पित धुनुची नृत्य
(कुमार कृष्णन – विभूति फीचर्स)
नवरात्रि और दुर्गा पूजा का समय आते ही पूरे बंगाल में भक्ति और उत्सव का अनोखा संगम दिखाई देता है। रोशनी से जगमगाते पंडालों में जब माँ दुर्गा की प्रतिमा विराजमान होती है, तो वातावरण में श्रद्धा और ऊर्जा की लहर दौड़ जाती है। इसी माहौल में शुरू होता है एक ऐसा नृत्य, जो केवल शरीर का नहीं बल्कि आत्मा का उत्सव है – धुनुची नृत्य
धुनुची नृत्य का महत्व
धुनुची नृत्य को माँ दुर्गा की आराधना का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इसके बिना दुर्गा पूजा अधूरी है। यह नृत्य देवी के सामने हाथों में जलती हुई धुनुची लेकर किया जाता है, जिसमें नारियल के खोल या कोयले पर धूप जलाकर वातावरण को शुद्ध किया जाता है।
पुराणों के अनुसार, महिषासुर वध से पूर्व देवी दुर्गा ने शक्ति संचय के लिए इसी नृत्य का प्रदर्शन किया था। तभी से माना जाता है कि धुनुची नृत्य के माध्यम से भक्त माँ दुर्गा के प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्त करते हैं और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति पाते हैं।
परंपरा से उत्सव तक का सफर
धुनुची नृत्य की शुरुआत जमींदारों के घरों में हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे कोलकाता और बंगाल में बारवारी पूजा का हिस्सा बन गई। आज यह न केवल धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा है बल्कि प्रतियोगिता और सांस्कृतिक उत्सव का भी रूप ले चुका है।
ढाक की थाप, शंख की गूंज और धुनुची से उठते धुएं के बीच जब भक्त ताल पर नृत्य करते हैं, तो पूरा वातावरण दिव्यता से भर उठता है। पुरुष और महिलाएं दोनों, लिंग भेद से परे, इस नृत्य में भाग लेकर सामूहिक भक्ति और एकता का परिचय देते हैं।
आधुनिक युग में धुनुची नृत्य
आज धुनुची नृत्य केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। देशभर के विभिन्न राज्यों और दुर्गा पूजा पंडालों में इसे बड़े उत्साह से किया जाता है। महिलाएं पारंपरिक लाल-सफेद साड़ियों में जब जलती हुई धुनुची लेकर थिरकती हैं, तो यह दृश्य भक्ति और सौंदर्य दोनों का अनोखा मेल बन जाता है।
यह नृत्य न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि बंगाली लोक संस्कृति, सामाजिक एकता और पीढ़ियों से चली आ रही विरासत का जीवंत परिचय भी है।
आध्यात्मिक और भावनात्मक अनुभव
दुर्गा पूजा के अंतिम दिन, विसर्जन से पहले, जब विदाई की घड़ी नज़दीक होती है, तब धुनुची नृत्य और अधिक भावपूर्ण हो जाता है। थके हुए चेहरे, धुएं से भरे पंडाल और माँ के चरणों में डूबे भक्त – यह दृश्य किसी भी दर्शक को भक्ति में सराबोर कर देता है।
धुनुची नृत्य को कोई भक्ति कहे, कोई लोकनृत्य या कोई उत्सव – पर इसका सार यही है कि यह एक आध्यात्मिक यात्रा है। इसमें समय थम जाता है, और आत्मा माँ की उपस्थिति में विलीन हो जाती है। इसीलिए बंगाल में कहा जाता है –
“माँ की पूजा भले समाप्त हो जाए, लेकिन धुनो की खुशबू हमेशा बनी रहती है।”


