कर्नाटक से उठा नया सियासी तूफान , राष्ट्रपिता पर टिप्पणी से बढ़ा विवाद

Karnataka raises fresh political storm: Controversy escalates over remarks on Father of the Nation
 
कर्नाटक से उठा नया सियासी तूफान , राष्ट्रपिता पर टिप्पणी से बढ़ा विवाद
देश की राजनीति में इतिहास, राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इस बार विवाद की शुरुआत कर्नाटक से हुई, जहां विजयपुरा से भाजपा विधायक Basangouda Patil Yatnal के एक बयान ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। उनके वक्तव्य पर न केवल विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी, बल्कि उनकी अपनी पार्टी को भी स्पष्टीकरण देना पड़ा।

क्या कहा विधायक ने?

एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान यतनल ने Mahatma Gandhi को लेकर विवादित टिप्पणी करते हुए कहा कि गांधी भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के राष्ट्रपिता हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग ‘वंदे मातरम’ नहीं कहते, उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए।

इसके साथ ही उन्होंने यह दावा भी किया कि Jawaharlal Nehru भारत के पहले प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि उनके अनुसार यह सम्मान Subhas Chandra Bose को मिलना चाहिए। हालांकि ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, नेताजी ने 1943 में सिंगापुर में आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना की थी, जबकि स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ही थे।

विपक्ष का पलटवार

विधायक के बयान के बाद विपक्षी दलों ने भाजपा पर निशाना साधा। कांग्रेस नेता Priyank Kharge ने इसे गांधी के योगदान का अपमान बताया और सवाल उठाया कि पार्टी ऐसे बयानों पर कार्रवाई क्यों नहीं करती। वहीं Mamata Banerjee ने इस बयान को विभाजनकारी राजनीति करार देते हुए कहा कि ऐसे वक्तव्य समाज में दरार डालते हैं।

भाजपा की प्रतिक्रिया

मामला बढ़ता देख भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष B. Y. Vijayendra ने स्पष्ट किया कि यह विधायक का निजी विचार है और पार्टी का इससे कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि भाजपा गांधी और डॉ. अंबेडकर दोनों का सम्मान करती है।हालांकि राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी के भीतर इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग मत हैं, जिससे आंतरिक असहमतियां भी उजागर हो रही हैं।

पहले भी रहे हैं विवादों में

यतनल इससे पहले भी कई बार पार्टी लाइन से अलग बयान दे चुके हैं। उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री B. S. Yediyurappa का करीबी माना जाता है, जिससे यह मामला और संवेदनशील हो गया है।

आगे क्या?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कर्नाटक विधानसभा के आगामी सत्र में यह मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया जा सकता है। विपक्ष इसे भाजपा के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में है।अब नजर इस बात पर है कि पार्टी विधायक के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कदम उठाती है या यह विवाद भी बयानबाजी तक सीमित रह जाएगा। इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रतीकों पर दिए गए बयान अक्सर व्यापक राजनीतिक और सामाजिक असर छोड़ते हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद कर्नाटक ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना रह सकता है।

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