मालवी लोकगीतों को समर्पित व्यक्तित्व: हीरासिंह बोरलिया

A personality dedicated to Malvi folk songs: Heera Singh Borliya
 
मालवी लोकगीतों को समर्पित व्यक्तित्व: हीरासिंह बोरलिया

(मुकेश “कबीर” – विभूति फीचर्स)हीरासिंह बोरलिया ऐसा नाम है, जिन्होंने मालवी लोकगीतों को न केवल क्षेत्रीय पहचान दी, बल्कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाकर इस लोकविधा को वैश्विक सम्मान दिलाया। कभी सीमित दायरे में सिमटी मालवी लोकसंगीत परंपरा को उन्होंने जनमानस में इतना लोकप्रिय बनाया कि आज नई पीढ़ी न केवल इसे सीख रही है, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत भी कर रही है।

हीरासिंह बोरलिया का जन्म 27 जनवरी 1934 को मध्य प्रदेश के उज्जैन में हुआ। उनके पूर्वज राजस्थान के जालौर जिले के बोरली गाँव से उज्जैन आकर बसे थे, इसी कारण उनका उपनाम बोरलियापड़ा। घर में लोकगायन की सशक्त परंपरा थी, इसलिए बाल्यावस्था से ही उनका रुझान संगीत की ओर हो गया। उनकी पहली गुरु उनकी माता रमा बाई रहीं, जिनसे उन्होंने लोकगायन की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की।

 

इसके बाद उन्होंने उस दौर के प्रतिष्ठित संगीत गुरुओं—डॉ. श्याम परमार, पद्मश्री देवीलाल सामर और सुप्रसिद्ध संगीतकार रविंद्र जैन—से लोकसंगीत एवं गायन की विधिवत शिक्षा ली। आगे चलकर रविंद्र जैन की टीम में उनके सुपुत्र, प्रसिद्ध ढोलक वादक अनूप सिंह बोरलिया भी शामिल हुए। अनूप सिंह ने राम तेरी गंगा मैली सहित अनेक फिल्मों में ढोलक वादन किया और ऐतिहासिक धारावाहिक रामायण में भी अपना सांगीतिक योगदान दिया।

 

वर्तमान में अनूप सिंह बोरलिया अपने पिता की समृद्ध विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। वे मुंबई और उज्जैन में शागिर्दों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। उन्हें मध्य प्रदेश संगीत नाटक अकादमी द्वारा गुरु नियुक्त किया गया है, जहाँ वे शासन की छात्रवृत्ति योजना के अंतर्गत बच्चों को ढोलक, घुँघरू सहित अनेक प्राचीन तालवाद्य सिखाते हैं। वे अपने पिता की स्मृतियों और उपलब्धियों को संजोए हुए उनकी कला-यात्रा को नई पीढ़ी तक पहुँचा रहे हैं।

 

हीरासिंह बोरलिया ने अपने करियर की शुरुआत एक संगीत शिक्षक के रूप में की। वे खैरागढ़ विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे और साथ-साथ देशभर में मालवी लोकगीतों का प्रचार-प्रसार करते रहे। वे दूरदर्शन मध्य प्रदेश के नियमित कलाकार थे और अनेक निजी चैनलों पर मालवी लोकगीत एवं कबीर गायन की प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ देते रहे।

 

उनकी प्रतिभा को राष्ट्रीय पहचान तब मिली जब उन्हें एक राष्ट्रीय चैनल पर प्रसारित रियलिटी शो “जुनून – सात सुरों का” में लोकगीत श्रेणी में देश का प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त उन्हें मध्य प्रदेश शासन का प्रतिष्ठित ‘मालव कलाकार पुरस्कार’ भी प्रदान किया गया। उनके व्यापक कार्यक्षेत्र और योगदान पर अनेक विद्यार्थियों ने शोधग्रंथ लिखे और पीएचडी की उपाधियाँ प्राप्त कीं।आजादी के 75 वर्ष पूर्ण होने पर भारत सरकार द्वारा आयोजित ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के अंतर्गत भी हीरासिंह बोरलिया को प्रतिष्ठित ‘अमृत अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया।

 

भारत के साथ-साथ विदेशों में भी उन्होंने मालवी लोकगीतों का प्रचार किया। विशेष रूप से फ्रांस दौरा अत्यंत सफल और ऐतिहासिक रहा, जहाँ एक प्रस्तुति के बाद उन्हें लगातार चालीस मंचों पर आमंत्रित किया गया। पूरे दो महीनों तक फ्रांस में उनके सम्मानपूर्वक कार्यक्रम आयोजित हुए।

 

गायन के साथ-साथ हीरासिंह बोरलिया का एक बड़ा योगदान यह भी रहा कि उन्होंने लोकगीतों को व्यवस्थित रूप से संकलित और संरक्षित किया। उन्होंने अपनी पुत्री के सहयोग से विभिन्न परंपराओं के लोकगीतों को पुस्तक रूप में प्रकाशित कर आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर के रूप में सुरक्षित किया। मालवी लोकगीतों को जीवन समर्पित करने वाले ऐसे महान कलाकार हीरासिंह बोरलिया की पावन स्मृति को कोटि-कोटि प्रणाम।

Tags