पुरानी सेवा जोड़ने से 200 करोड़ का अतिरिक्त बोझ, चयनित प्राध्यापक विरोध के मूड में
Adding old service will result in an additional burden of Rs 200 crore, selected professors in a mood of protest
Sat, 20 Sep 2025
लखनऊ। उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा निदेशालय, प्रयागराज द्वारा हाल ही में जारी आदेश ने राज्य के शिक्षा जगत में नई बहस छेड़ दी है। निदेशालय ने 2016 में विनियमित किए गए लगभग 290 संविदा प्राध्यापकों की पुरानी सेवाओं को कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस निर्णय का कड़ा विरोध उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग से चयनित नियमित प्राध्यापक कर रहे हैं।
नियमित शिक्षकों का कहना है कि संविदा काल की सेवाओं को जोड़ने से राजकोष पर करीब 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। इसके साथ ही विभागीय स्तर पर कई विसंगतियों और अव्यवस्थाओं की भी आशंका है।
संविदा नियुक्तियों पर सवाल
आयोग से चयनित प्राध्यापकों का तर्क है कि 2005 से 2008 के बीच संविदा पर हुई नियुक्तियां महज अंतरिम व्यवस्था थीं। इन्हें केवल तब तक रखा गया था जब तक लोक सेवा आयोग से चयनित प्राध्यापक या शासन से स्थानांतरित शिक्षक कार्यभार ग्रहण न कर लें। इसके बावजूद 2016 में इन संविदा प्राध्यापकों को स्थाई शिक्षकों के समान सेवा लाभ प्रदान करते हुए विनियमित कर दिया गया। अब उनकी संविदा अवधि को भी CAS में शामिल करने की तैयारी नियम विरुद्ध है और सीधे तौर पर स्थाई प्राध्यापकों के अधिकारों पर चोट है।
अदालत का हवाला
प्राध्यापकों ने यह भी उल्लेख किया कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्णय दिया था कि असिस्टेंट प्रोफेसर की पदोन्नति में संविदा अवधि को जोड़ना अनुचित है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग द्वारा संविदा शिक्षकों के पक्ष में कदम उठाना संदेह पैदा करता है।
दोहरे मानदंड पर सवाल
नियमित प्राध्यापक यह भी कहते हैं कि जिस प्रदेश में 1.40 लाख शिक्षामित्रों को योग्यता की कमी के कारण स्थाई सेवा से बाहर कर दिया गया और माध्यमिक शिक्षा विभाग के लगभग 2200 शिक्षकों को हटाना पड़ा, वहां मात्र 290 संविदा प्राध्यापकों को विशेष लाभ देने की तैयारी न्यायसंगत नहीं है। यदि यह लाभ दिया गया तो भविष्य में वे पुरानी पेंशन समेत अन्य सुविधाओं की मांग भी करेंगे। इससे न केवल वित्तीय दबाव बढ़ेगा बल्कि अशासकीय सहायता प्राप्त महाविद्यालयों के तदर्थ शिक्षक भी अपनी पुरानी सेवाएं जोड़ने का दावा कर सकते हैं।
आंदोलन की तैयारी
नियमित प्राध्यापकों ने संकेत दिया है कि यदि संविदा अवधि को जोड़ने का निर्णय लागू किया गया तो वे इस अन्याय के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ेंगे। उनका मानना है कि यह कदम शिक्षा व्यवस्था और वित्तीय अनुशासन दोनों पर गंभीर संकट खड़ा करेगा।
