मिलावट का ज़हर: नकली दूध-घी से कार्बाइड वाले फलों तक बढ़ता खतरा
(पंकज शर्मा "तरुण" – विनायक फीचर्स)
खाद्य पदार्थों में मिलावट आज एक गंभीर और चिंताजनक समस्या बन चुकी है। नकली दूध-घी की फैक्ट्रियां पकड़ी जा रही हैं, फलों और सब्जियों में रसायनों व इंजेक्शन का इस्तेमाल हो रहा है—क्या यही विकास की निशानी है? यह सवाल सुनने में भले अटपटा लगे, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा कड़वी है।
खाद्य मिलावट केवल कानूनन अपराध ही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि कई मामलों में ऐसे अपराधों पर सख्त कार्रवाई के बजाय लापरवाही या भ्रष्टाचार के चलते आरोपियों को बच निकलने का मौका मिल जाता है। प्रशासन और जिम्मेदार तंत्र की उदासीनता इस समस्या को और गंभीर बना रही है।
देश की आम जनता इस स्थिति को जैसे अपनी नियति मान चुकी है। समय-समय पर खाद्य विभाग द्वारा सैंपलिंग की औपचारिकता जरूर निभाई जाती है, लेकिन उसके बाद कार्रवाई का असर ज़मीन पर कम ही दिखाई देता है। नतीजा यह है कि लोग धीरे-धीरे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।
खाद्य विभाग की संरचना और संसाधनों की कमी भी एक बड़ी समस्या है। कई बार एक ही अधिकारी को कई जिलों का जिम्मा संभालना पड़ता है, जिससे प्रभावी निगरानी संभव नहीं हो पाती। ऐसे में मिलावटखोरों के हौसले बुलंद होना स्वाभाविक है।

बाजार में बच्चों के लिए आकर्षक पैकेजिंग में बिकने वाले सस्ते स्नैक्स और वेफर्स भी चिंता का विषय हैं। इनमें निम्न गुणवत्ता की सामग्री का इस्तेमाल होने के बावजूद ये धड़ल्ले से बिक रहे हैं। रंग-बिरंगे पैकेट बच्चों को आकर्षित करते हैं, लेकिन इनके दुष्प्रभाव लंबे समय में गंभीर हो सकते हैं।
फलों और सब्जियों में भी मिलावट का स्तर चिंताजनक है। आम, पपीता और केले जैसे फलों को जल्दी पकाने के लिए प्रतिबंधित रसायनों का उपयोग किया जा रहा है। इसी तरह सब्जियों को तेजी से बड़ा करने के लिए भी हानिकारक इंजेक्शन लगाए जा रहे हैं। ये सभी उपाय न केवल गैरकानूनी हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं।
स्थिति यह है कि आम व्यक्ति के सामने सवाल खड़ा है—वह इन मिलावटी खाद्य पदार्थों से खुद को कैसे बचाए? जब निगरानी तंत्र कमजोर हो और जागरूकता सीमित, तो खतरा और बढ़ जाता है। खाद्य सुरक्षा केवल सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के हर व्यक्ति की साझी जिम्मेदारी है। सख्त कानूनों का पालन, पारदर्शी कार्रवाई, और उपभोक्ताओं की जागरूकता ही इस समस्या से निपटने का रास्ता दिखा सकती है। वरना यह “धीमा ज़हर” आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकता है।
