संभलने की उम्र: किशोरियों में बढ़ती उत्सुकता और पारिवारिक संस्कारों की अहम भूमिका

The Age to Find One's Bearings: Rising Curiosity Among Adolescent Girls and the Crucial Role of Family Values
 
संभलने की उम्र: किशोरियों में बढ़ती उत्सुकता और पारिवारिक संस्कारों की अहम भूमिका
वैचारिक विमर्श (अमृत उजाला): किशोरावस्था (Adolescence) जीवन का वह पड़ाव है जहां मन में असीमित उत्सुकता और शारीरिक व मानसिक बदलावों का एक तूफान चल रहा होता है। आज के बदलते परिवेश में भारतीय किशोरियां एक अजीब से द्वंद्व से गुजर रही हैं। उम्र के इस नाजुक मोड़ पर दुनिया की समझ अधूरी होती है, लेकिन नई चीजों को जानने और परखने की इच्छा बहुत तीव्र होती है। उचित मार्गदर्शन के अभाव में कई बार यही उत्सुकता और नासमझी उन्हें बड़ी मुश्किलों में डाल देती है।

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शोहदों का जाल और संभलने की चुनौती

इस उम्र में अक्सर किशोरियां बाहरी दुनिया के दिखावे और चकाचौंध से जल्दी प्रभावित हो जाती हैं, जिसका फायदा असामाजिक तत्व उठाते हैं: कई बार कुछ युवक किशोरियों को झूठे सपने, मीठी बातें और सुनहरे भविष्य का झांसा देकर अपने जाल में फंसा लेते हैं।इस तरह के मानसिक प्रभाव (Brainwashing) में आने के बाद लड़कियां अपने ही माता-पिता, भाई-बहन और शुभचिंतकों की बातों को नजरअंदाज करने लगती हैं। जब तक उन्हें वास्तविकता का अहसास होता है, तब तक वे अपना बड़ा नुकसान कर चुकी होती हैं।

तबाही से बचाने का रास्ता: घर और परिवार की जिम्मेदारी

किशोरियों को इस भटकाव से सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी समाधान परिवार के भीतर से ही शुरू होता है। इसमें माता-पिता की भूमिका सबसे प्राथमिक है बच्चों के सामने माता-पिता को खुद को एक आदर्श रोल मॉडल के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए। घर में सकारात्मक, नैतिक और आध्यात्मिक माहौल होना जरूरी है। बच्चों को अपनी गौरवशाली संस्कृति, सभ्यता और मानवीय मूल्यों से जोड़ना आवश्यक है। किशोरियों को यह सिखाना जरूरी है कि वे परिवार, समाज और बंधु-बांधवों के साथ कैसा गरिमापूर्ण आचरण करें। इस उम्र में लड़कियां अपने आस-पास के माहौल को बहुत तेजी से ग्रहण करती हैं, इसलिए परिजनों के व्यवहार का उन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

क्या देखें और क्या सीखें? डिजिटल युग की चुनौतियाँ

आज के इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में किशोरियों के सामने परोसी जा रही सामग्री (Content) पर ध्यान देना बेहद जरूरी है माता-पिता को बच्चों के सामने हिंसक या अश्लील रील्स और फिल्मों को देखने से बचना चाहिए। इसके बजाय उन्हें प्रेरणादायक, ज्ञानवर्धक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध कार्यक्रमों को देखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। आधुनिक शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ किशोरियों को भारतीय कला, नृत्य, संगीत और श्रृंगार के सकारात्मक पहलुओं के प्रति जागरूक करना चाहिए। आपकी बेटी स्कूल, कॉलेज या ट्यूशन में किन सहेलियों के साथ समय बिता रही है, उसकी सहेलियां कौन हैं, इसकी जानकारी रखना माता-पिता का दायित्व है। यदि शैक्षणिक संस्थानों में किसी प्रकार की गड़बड़ी या असुरक्षा दिखे, तो तुरंत प्रबंधन से शिकायत करनी चाहिए।

परिपक्वता और उज्ज्वल भविष्य की ओर कदम

जैसे ही लड़कियां २०-२१ वर्ष की आयु के आसपास पहुंचती हैं, उनमें मानसिक परिपक्वता (Maturity) आने लगती है। इस उम्र तक आते-आते वे सही और गलत का अंतर समझने में पूरी तरह सक्षम हो जाती हैं।

  • खुलकर बात करने की आदत: यदि बचपन से ही घर में संवाद का अच्छा माहौल हो, तो युवतियां अपने हर अच्छे-बुरे अनुभव को अपनी मां या बड़ी बहन से बिना किसी झिझक के साझा कर सकती हैं, जिससे वे गलत रास्तों पर जाने से बच जाती हैं।

  • अगली पीढ़ी का निर्माण: आज की संस्कारी और जागरूक बेटी ही कल एक स्वाभिमानी और समझदार माँ बनती है। वह अपनी आने वाली पीढ़ी को भी संतोष, ईमानदारी और विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने का पाठ पढ़ा सकती है।

 किशोरावस्था को पाबंदियों से नहीं, बल्कि प्यार, विश्वास और सही संस्कारों के पुल से सुरक्षित बनाया जा सकता है। जब रिश्तों में संवाद की मजबूती होती है, तो बाहरी लालच और झांसे स्वतः बेअसर हो जाते हैं।

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