महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव 2026: AIMIM के उभार ने बदले सियासी समीकरण

 
AIMIMs Massive Win in Maharashtra Civic Polls 2026

आज की खबर इतनी बड़ी है कि महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल आ गया है। जी हां, बात हो रही है असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM की, जिसने महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में ऐसा प्रदर्शन किया है कि हर राजनीतिक दल चौंक गया है। सवाल सिर्फ जीत का नहीं है, सवाल है इसके मायनों का। तो चलिए, इस पूरी स्टोरी को राजनीतिक नजरिए से डीकोड करते हैं।

15 जनवरी 2026 को हुए महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों में AIMIM ने रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन किया। पार्टी ने कुल 121 से 126 वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि पिछले चुनावों में ये आंकड़ा सिर्फ 56 था। यानी सीधा-सीधा दोगुने से ज्यादा की छलांग। 29 नगर निगमों में से 24 में AIMIM ने अपने उम्मीदवार उतारे और कई जगहों पर स्थापित पार्टियों को बड़ा झटका दिया।

सबसे बड़ा धमाका हुआ छत्रपति संभाजीनगर में, जिसे पहले औरंगाबाद कहा जाता था। यहां AIMIM ने 115 में से 33 सीटें जीत लीं और बीजेपी के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। मालेगांव में 21 सीटें, नांदेड़ में 13–14, अमरावती में 12–15, धुले में 10, सोलापुर और मुंबई में 8-8 सीटें जीतकर पार्टी ने साफ संदेश दे दिया कि वो अब सीमित दायरे की पार्टी नहीं रही।

इतना ही नहीं, नागपुर में 6–7 सीटें, ठाणे में 5, अकोला में 3, अहमदनगर और जालना में 2-2 और चंद्रपुर में 1 सीट जीतकर AIMIM ने पूरे महाराष्ट्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, ये एक राजनीतिक शिफ्ट का संकेत हैं।

इन चुनावों में सबसे बड़ा नुकसान समाजवादी पार्टी, एनसीपी (शरद पवार गुट) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को हुआ। MNS को पूरे राज्य में सिर्फ 6–7 सीटों पर संतोष करना पड़ा, SP का लगभग सूपड़ा साफ हो गया और NCP-SP को महज 1–2 सीटें ही मिलीं। AIMIM अब महाराष्ट्र की छठी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।

दिलचस्प बात ये है कि चुनाव से पहले AIMIM की महाराष्ट्र यूनिट में भारी उथल-पुथल थी। मुंबई यूनिट के अध्यक्ष फारूक शबदी ने टिकट बंटवारे को लेकर इस्तीफा दे दिया, राज्य अध्यक्ष इम्तियाज जलील को धमकियां मिलीं और गुटबाजी खुलकर सामने आई। लेकिन इसके बावजूद पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया।

इस जीत के पीछे ओवैसी ब्रदर्स की सीधी दखल अहम रही। असदुद्दीन ओवैसी और अकबरुद्दीन ओवैसी ने खुद मैदान में उतरकर रैलियां कीं, जनसभाएं लीं और ग्राउंड लेवल पर कैंपेन को मजबूत किया। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कहा कि ये चुनाव बुनियादी मुद्दों पर लड़े गए और जनता ने उन पार्टियों को नकार दिया जो सालों से जीतकर भी काम नहीं कर रही थीं।

एक अहम और चौंकाने वाली बात ये रही कि AIMIM की जीत सिर्फ मुस्लिम वोटों तक सीमित नहीं रही। इम्तियाज जलील के मुताबिक, अनुसूचित जाति और जनजाति के हिंदू वोटर्स ने भी AIMIM को समर्थन दिया। संभाजीनगर का गुलमंडी वार्ड, जो परंपरागत रूप से शिवसेना-बीजेपी का गढ़ माना जाता था, वहां AIMIM ने चार में से दो सीटें जीत लीं।

AIMIM ने इस बार रणनीतिक तौर पर कई जगह गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिससे पार्टी का वोट बेस और बड़ा हुआ। 2017 में मुंबई में सिर्फ 2 सीटें जीतने वाली AIMIM अब 8 सीटों पर पहुंच गई है और BMC हेडक्वार्टर में ऑफिस और ग्रुप लीडर का दर्जा भी हासिल कर लिया है।

इस जीत ने महाराष्ट्र की राजनीति के समीकरण बदल दिए हैं। मराठवाड़ा, पश्चिमी महाराष्ट्र और मुंबई-ठाणे बेल्ट में AIMIM तेजी से पैर जमा रही है। अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में कांग्रेस और NCP को पीछे छोड़कर पार्टी ने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

कई नगर निगमों में जहां किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, वहां AIMIM की भूमिका बेहद अहम हो सकती है। समर्थन दे या विपक्ष में बैठे—दोनों ही हालात में पार्टी की ताकत बढ़ी है। यानी AIMIM अब सिर्फ खिलाड़ी नहीं, बल्कि गेमचेंजर बनती दिख रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि AIMIM का उभार मुस्लिम राजनीति के नए दौर की शुरुआत है। पत्रकार सबा नकवी के मुताबिक, ओवैसी उन मुद्दों पर बोलते हैं जहां पारंपरिक सेक्युलर पार्टियां खामोश रहती हैं। वहीं, यशवंत देशमुख कहते हैं कि ओवैसी की ऑर्गेनिक ग्रोथ अब एक राजनीतिक हकीकत बन चुकी है।

हालांकि बीजेपी ने कुल मिलाकर 1400 से ज्यादा सीटें जीती हैं, लेकिन AIMIM का उभार मुस्लिम वोटों को एकजुट कर रहा है, जो कांग्रेस और अन्य सेक्युलर दलों के लिए बड़ा झटका है। ओवैसी ने खुद कहा कि ये जीत जनता की सक्रिय भागीदारी का नतीजा है।

2024 लोकसभा चुनावों के बाद आई ये जीत AIMIM की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को और मजबूत करेगी। अब सवाल ये है कि क्या पार्टी उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में भी इसी तरह विस्तार करेगी? 2029 लोकसभा चुनाव से पहले ये एक बड़ा फैक्टर बन सकती है।

तो दोस्तों, AIMIM की ये जीत सिर्फ सीटों की जीत नहीं है, ये एक राजनीतिक संदेश है। क्या ये महाराष्ट्र की राजनीति को नई दिशा देगी या और ज्यादा ध्रुवीकरण बढ़ाएगी? आपकी राय क्या है? कमेंट में जरूर बताएं।

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