अक्षय तृतीया: अन्नपूर्णा की आस्था, लाड़ली लक्ष्मी का सशक्तिकरण और मानवीय चेतना का महापर्व
Akshaya Tritiya: A festival of faith in Annapurna, empowerment of Ladli Lakshmi and human consciousness
Sun, 19 Apr 2026
(डॉ. राघवेंद्र शर्मा — विभूति फीचर्स)
भारतीय वाङ्मय में समय को केवल गणना का विषय नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना के रूप में देखा गया है। प्रत्येक तिथि अपने भीतर एक विशिष्ट ऊर्जा और आध्यात्मिक संदेश समेटे होती है। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया, जिसे अक्षय तृतीया या ‘आखातीज’ कहा जाता है, इसी परंपरा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। ‘अक्षय’ का अर्थ है—जो कभी नष्ट न हो, जो शाश्वत बना रहे। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक उत्तरदायित्व और आधुनिक विकास का अद्भुत संगम है।
आध्यात्मिक और पौराणिक महत्त्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर भगवान विष्णु ने भगवान परशुराम के रूप में अवतार लिया। यही दिन माता गंगा के पृथ्वी पर अवतरण का भी प्रतीक है, जिसने मानवता को पवित्रता और जीवन का आधार प्रदान किया।
इसी दिन माता अन्नपूर्णा का प्राकट्य माना जाता है, जो यह सिखाती हैं कि संसार का पोषण केवल अन्न से नहीं, बल्कि सेवा, करुणा और संवेदनशीलता से होता है। धार्मिक दृष्टि से इस दिन किया गया दान, जप और तप ‘अक्षय’ फल प्रदान करता है।
सामाजिक चेतना और सशक्तिकरण
वर्तमान समय में मध्य प्रदेश सरकार ने अक्षय तृतीया को सामाजिक सशक्तिकरण के एक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया है। डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में वर्ष 2026 में सामूहिक विवाह कार्यक्रमों और जनकल्याणकारी योजनाओं का समन्वय किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री कन्या विवाह एवं निकाह योजना के माध्यम से बेटियों को आर्थिक सहायता और आवश्यक सामग्री प्रदान कर उनके भविष्य को सुदृढ़ बनाया जा रहा है। साथ ही ‘लाड़ली लक्ष्मी’ और ‘लाड़ली बहना’ जैसी योजनाओं से महिला शिक्षा और स्वावलंबन को नई दिशा दी जा रही है।
अबूझ मुहूर्त और सामाजिक समरसता
अक्षय तृतीया को ‘अबूझ मुहूर्त’ माना जाता है, अर्थात इस दिन किसी भी शुभ कार्य के लिए विशेष ज्योतिषीय गणना की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि यह दिन सामूहिक विवाहों के लिए अत्यंत लोकप्रिय है।
सामूहिक विवाह न केवल आर्थिक रूप से सहायक होते हैं, बल्कि यह सामाजिक समरसता को भी बढ़ावा देते हैं। एक ही मंच पर विभिन्न वर्गों के लोग एकत्र होकर समानता और सद्भाव का संदेश देते हैं, जिससे जातिगत और आर्थिक भेदभाव कम होते हैं।
कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता
हालांकि, इस पावन अवसर के साथ बाल विवाह जैसी कुरीति भी जुड़ी रही है, जो समाज के लिए गंभीर चुनौती है। बाल विवाह बच्चों के अधिकारों, शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ अन्याय है।
सरकार और समाज ‘शून्य सहनशीलता’ की नीति अपनाकर इस कुप्रथा के उन्मूलन के लिए प्रतिबद्ध हैं। ‘लाडो अभियान’ जैसे प्रयासों से जागरूकता बढ़ रही है और अब समाज का प्रत्येक वर्ग इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
कृषि और अर्थव्यवस्था से जुड़ाव
अक्षय तृतीया का गहरा संबंध भारत की कृषि परंपरा से भी है। किसान इस दिन को नई फसल और नई शुरुआत का प्रतीक मानते हैं। जैविक खेती, उन्नत बीजों का वितरण और कृषि महोत्सव इस बात का संकेत हैं कि हमारी प्रगति की जड़ें आज भी धरती से जुड़ी हैं।
‘अक्षय कृषि’ का विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों के संरक्षण और सतत विकास का संदेश देता है।
अक्षय तृतीया केवल स्वर्ण क्रय या धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं है, बल्कि यह मानवीय मूल्यों, सेवा, परोपकार और सामाजिक उत्तरदायित्व का उत्सव है। यह हमें प्रेरित करता है कि हम केवल भौतिक संपदा नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार और सद्कर्मों की ऐसी पूंजी अर्जित करें जो कभी समाप्त न हो।

