अमेरिका पर कर्ज़ का पहाड़, फिर भी डॉलर का जलवा बरकरार
(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विनायक फीचर्स) अमेरिका आज दुनिया का सबसे बड़ा कर्ज़दार देश है, लेकिन उसकी मुद्रा डॉलर अब भी विश्व की सबसे मज़बूत और प्रभावशाली करेंसी बनी हुई है। पहली नज़र में यह एक विरोधाभास लगता है—जिस देश पर सबसे ज़्यादा कर्ज़ हो, उसकी मुद्रा पर दुनिया को सबसे ज़्यादा भरोसा कैसे हो सकता है?
लेकिन जब हम वैश्विक अर्थव्यवस्था, राजनीति और इतिहास की परतें खोलते हैं, तो समझ में आता है कि डॉलर की ताकत केवल आर्थिक आँकड़ों का खेल नहीं, बल्कि भरोसे, संस्थागत व्यवस्था और विकल्पों के अभाव की कहानी है।
डॉलर की मजबूती की सबसे बुनियादी वजह यह है कि वह दुनिया की प्रमुख “रिज़र्व करेंसी” है। लगभग हर देश का केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा डॉलर में रखता है, ताकि आपात स्थिति, आयात-भुगतान या वित्तीय संकट के समय उसके पास सबसे अधिक स्वीकार्य अंतरराष्ट्रीय मुद्रा मौजूद रहे।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा—खासतौर पर तेल, गैस, सोना और अन्य कमोडिटी—आज भी डॉलर में ही मूल्यांकित होता है। नतीजतन, कोई देश अमेरिका से व्यापार करे या न करे, वैश्विक लेन-देन के लिए उसे डॉलर की ज़रूरत पड़ती ही है। यही स्थायी और संरचनात्मक माँग डॉलर को मजबूती देती रहती है, चाहे अमेरिकी सरकारी कर्ज़ कितना ही क्यों न बढ़ जाए।
दूसरा अहम कारण है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था आज भी दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे विविध अर्थव्यवस्था है। विशाल उपभोक्ता बाज़ार, अग्रणी तकनीकी कंपनियाँ, नवाचार की सशक्त संस्कृति और अत्यधिक उत्पादक कार्यबल—इन सबके कारण निवेशकों को भरोसा रहता है कि अमेरिका दीर्घकाल में अपनी देनदारियाँ चुकाने की क्षमता रखता है।
आर्थिक मंदी, वित्तीय संकट या भू-राजनीतिक तनाव—हर मुश्किल दौर में वैश्विक पूँजी अंततः “सेफ हेवन” की तलाश करती है, और यह ठिकाना अक्सर अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड ही होते हैं। यही वजह है कि कई बार संकट बढ़ने पर भी डॉलर कमजोर होने के बजाय और मज़बूत हो जाता है।

अमेरिका का विशाल कर्ज़ एक ओर बोझ है, तो दूसरी ओर उसकी वित्तीय ताकत का साधन भी। अमेरिकी सरकार जिन ट्रेज़री बॉन्ड्स के ज़रिये कर्ज़ लेती है, उन्हें दुनिया के सबसे सुरक्षित निवेशों में गिना जाता है। सरकारें, केंद्रीय बैंक, पेंशन फंड, बीमा कंपनियाँ और बड़े निवेशक इन्हें इसलिए खरीदते हैं क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि अमेरिका अपने बॉन्ड भुगतान में डिफ़ॉल्ट नहीं करेगा।
इन बॉन्ड्स को खरीदने के लिए डॉलर चाहिए, और जितना ज़्यादा कर्ज़ लिया जाता है, उतनी ही डॉलर की वैश्विक माँग बनी रहती है। इस तरह अमेरिकी कर्ज़ बढ़ने के साथ-साथ दुनिया का डॉलर-सिस्टम में उलझाव भी गहराता चला जाता है।
अमेरिका को एक अनोखा विशेषाधिकार भी प्राप्त है—वह अपनी ही मुद्रा में कर्ज़ लेता है। अधिकांश विकासशील देशों को विदेशी मुद्रा, खासकर डॉलर में उधार लेना पड़ता है। उनकी अपनी मुद्रा कमजोर होते ही कर्ज़ का बोझ कई गुना बढ़ जाता है। इसके उलट, अमेरिका का लगभग पूरा सरकारी कर्ज़ डॉलर में है।
ज़रूरत पड़ने पर अमेरिकी केंद्रीय बैंक ब्याज दरों, बॉन्ड-खरीद या मुद्रा आपूर्ति के ज़रिये व्यवस्था को संभाल सकता है। यह क्षमता निवेशकों को भरोसा देती है कि अमेरिका के लिए तकनीकी रूप से दिवालिया होना बेहद कठिन है।
डॉलर की ताकत के पीछे केवल अर्थशास्त्र ही नहीं, बल्कि अमेरिका की राजनीतिक, सैन्य और संस्थागत शक्ति भी है। दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना, वैश्विक गठबंधन-तंत्र, मजबूत कूटनीति, स्वतंत्र न्यायपालिका, पारदर्शी वित्तीय बाज़ार और अपेक्षाकृत सुदृढ़ कॉर्पोरेट गवर्नेंस—ये सब मिलकर विदेशी निवेशकों में सुरक्षा की भावना पैदा करते हैं। उन्हें लगता है कि उनके अधिकार नियम-कानून के तहत सुरक्षित रहेंगे।
फिर भी यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह व्यवस्था हमेशा यूँ ही चलती रहेगी? अमेरिकी कर्ज़ जिस गति से बढ़ रहा है और ब्याज भुगतान जिस तरह बजट पर दबाव डाल रहे हैं, वह भविष्य में चुनौती बन सकता है। यदि राजनीतिक ध्रुवीकरण इतना बढ़ जाए कि “कर्ज़ सीमा” को लेकर वास्तविक डिफ़ॉल्ट का खतरा पैदा हो, तो डॉलर पर भरोसा डगमगा सकता है।
दूसरी ओर, यदि चीन, यूरोपीय संघ या BRICS जैसा कोई समूह एक विश्वसनीय, स्थिर और गहरे बॉन्ड-मार्केट वाली वैकल्पिक वैश्विक मुद्रा खड़ी कर दे, तो धीरे-धीरे दुनिया डॉलर से हटने पर विचार कर सकती है। फिलहाल ऐसी कोई परिपक्व वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद नहीं है।
निष्कर्षतः, अमेरिका का विशाल कर्ज़ और डॉलर की वैश्विक ताकत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक दुनिया यह तय नहीं कर पाती कि “डॉलर के बाद विकल्प क्या है”, तब तक कर्ज़ के पहाड़ के बावजूद डॉलर की गद्दी डोल सकती है—गिरती नहीं।
