विश्लेषण: आंतरिक असंतोष और संवादहीनता के दौर से गुजरती मध्य प्रदेश भाजपा
पवन वर्मा (विनायक फीचर्स)
राजनीति का सबसे संवेदनशील और खतरनाक दौर वह होता है, जब किसी नेतृत्व के इर्द-गिर्द हकीकत बयां करने वाले लोगों की कमी हो जाती है और केवल झूठी तारीफ करने वालों का घेरा बढ़ जाता है। ऐसे माहौल में वाहवाही के शोर के बीच संगठन की कमियां छिप जाती हैं और तालियों की गूंज सच का आईना धुंधला कर देती है।
मध्य प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने अपने कार्यकाल का पहला वर्ष पूरा कर लिया है। इस मौके पर उन्हें बधाइयां देने और उनके साक्षात्कारों को छापने की होड़ तो दिखी, लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक बड़ा यक्ष प्रश्न छूट गया—इस एक साल में संगठन ने क्या खोया और क्या पाया? यदि अनुशासन, संगठनात्मक विस्तार, जमीनी कार्यकर्ताओं से संवाद और सत्ता-संगठन के बीच तालमेल के पैमाने पर इस एक वर्ष का आकलन किया जाए, तो जमीनी हकीकत उतनी उजली नहीं है जितनी पेश की जा रही है।
1. ढीली पड़ती अनुशासन की डोर
भारतीय जनता पार्टी (BJP) को हमेशा से एक बेहद अनुशासित और कैडर-बेस्ड पार्टी माना जाता रहा है, जहां आंतरिक मतभेद दीवारों से बाहर नहीं आते। लेकिन खंडेलवाल के एक साल के कार्यकाल में यह अनुशासन दरकता हुआ नजर आया। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि पार्टी के भीतर से ही केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और अन्य वरिष्ठ नेताओं पर सीधे या परोक्ष रूप से तीखे तीर चलाए गए। इन बयानों ने न केवल पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया, बल्कि विपक्ष (कांग्रेस) को बैठे-बिठाए एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी दे दिया।
प्रमुख विवाद और बयानबाजी:
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कथित पत्र विवाद: हाल ही में कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा मुख्यमंत्री को लिखे गए एक कथित पत्र को लेकर सियासी बाजार गर्म रहा। हालांकि, विजयवर्गीय ने ऐसे किसी भी पत्र से इनकार किया, लेकिन इस विवाद ने यह संदेश तो दे ही दिया कि सरकार के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।
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सिंधिया खेमे पर निशाना: गुना के विधायक पन्ना लाल शाक्य लगातार केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक मंत्रियों (जैसे तुलसी राम सिलावट, गोविंद राजपूत, प्रद्युम्न सिंह तोमर) के खिलाफ सार्वजनिक रूप से मुखर रहे हैं।
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विधायकों की बेलगाम बयानबाजी: पिछोर विधायक प्रीतम लोधी, मऊगंज विधायक प्रदीप पटेल और चिंतामणि मालवीय जैसे नेता लगातार संगठन की गाइडलाइन के विपरीत जाकर बयानबाजी करते रहे हैं। वहीं, रतलाम ग्रामीण के विधायक मथुरालाल डामर ने अपनी ही सरकार के मंत्री राकेश सिंह को कटघरे में खड़ा कर दिया।
बड़ा सवाल: इन तमाम अनुशासनहीनताओं के बावजूद, प्रदेश अध्यक्ष एक वर्ष के भीतर एक अनुशासन समिति का गठन तक नहीं कर पाए। ऐसी समिति की अनुपस्थिति यह दर्शाती है कि या तो नेतृत्व इस मुद्दे को भांप नहीं पाया या फिर अनुशासन उनकी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं था।
2. संगठनात्मक विस्तार में सुस्ती और असंतोष
हेमंत खंडेलवाल के कार्यकाल में संगठन का विस्तार भी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा।
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सीमित कार्यकारिणी: प्रदेश कार्यकारिणी का जो गठन किया गया, उसका आकार काफी छोटा रखा गया। इसके चलते पार्टी के कई वरिष्ठ और समर्पित कार्यकर्ताओं को जगह नहीं मिल सकी, जिससे आंतरिक असंतोष पनपा।
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विशेष आमंत्रित सदस्यों की सूची में देरी: कार्यसमिति में विशेष आमंत्रित सदस्यों की नियुक्ति में एक साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी कोई सूची सामने नहीं आई। यह वर्ग पुराने और अनुभवी नेताओं को संगठन से जोड़े रखने का एक महत्वपूर्ण जरिया होता है, जिसमें देरी सांगठनिक कमजोरी को उजागर करती है।
3. जमीनी कार्यकर्ताओं से दूरी और सीमित दायरा
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बूथ स्तर का कार्यकर्ता होता है। लेकिन खंडेलवाल के नेतृत्व में कई जिलों से यह शिकायतें आईं कि प्रदेश अध्यक्ष अभी तक पुराने और जमीनी कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद स्थापित नहीं कर पाए हैं।
एक बड़े राजनैतिक दल के मुखिया से यह उम्मीद की जाती है कि वह लगातार जिलों का दौरा करे और संगठन की नब्ज को पहचाने। इसके विपरीत, पार्टी के भीतर यह चर्चा आम है कि प्रदेश अध्यक्ष का दायरा केवल कुछ चुनिंदा सलाहकारों और नेताओं तक ही सीमित होकर रह गया है, जिससे आम कार्यकर्ताओं में उपेक्षा का भाव जागा है।
4. सत्ता और संगठन का बिगड़ता संतुलन?
अपने कार्यकाल का एक साल पूरा होने पर खंडेलवाल ने भोपाल के कई समाचार पत्रों को इंटरव्यू दिए। इन साक्षात्कारों में उन्होंने एक ऐसा बयान दिया जो मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण माना जा रहा है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि 'डॉ. मोहन यादव के मंत्रिमंडल का जल्द ही विस्तार होगा।'
यद्यपि भाजपा में मंत्रिमंडल का विस्तार संगठन की सहमति से ही होता है, लेकिन इसका औपचारिक ऐलान करना केवल मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। इस तरह का बयान देकर खंडेलवाल ने शायद यह संदेश देने की कोशिश की कि सरकार पर संगठन का पूरा नियंत्रण है, जो कि राजनैतिक शिष्टाचार के खिलाफ माना जाता है।
किसी भी राजनीतिक नेतृत्व का अंतिम और पूर्ण मूल्यांकन उसके पूरे कार्यकाल के बाद ही संभव होता है। हेमंत खंडेलवाल के पास अभी भी अपनी कार्यशैली में सुधार करने, कमियों को दूर करने और संगठन को एक नई दिशा देने का पर्याप्त समय है। हालांकि, उनके पहले साल का यह रिपोर्ट कार्ड संकेत देता है कि एक विशाल संगठन के मुखिया के रूप में वे अभी तक अपनी वह गहरी और प्रभावी छाप नहीं छोड़ पाए हैं, जिसकी उम्मीद भाजपा जैसे दल में की जाती है।

