भ्रष्टाचार से उपजी अराजकता और स्वाधीन भारत

Anarchy resulting from corruption and independent India
 
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(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)
भारत आज़ाद हुए कई दशक बीत चुके हैं, परंतु लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त अवरोध अब भी चिंता का विषय बने हुए हैं। मौजूदा समय में जिस प्रकार अराजक गतिविधियाँ देश की प्रगति की राह रोकने का प्रयास कर रही हैं, उससे यह आवश्यक हो जाता है कि इनकी जड़ें तलाश की जाएँ। गहन विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका—तीनों ही अंगों में भ्रष्टाचार गहराई तक पैठ चुका है। जिन पर राष्ट्र को दिशा देने और पारदर्शिता के साथ व्यवस्था को संचालित करने का उत्तरदायित्व है, वही अपनी भूमिका निभाने में असफल प्रतीत हो रहे हैं। यही कारण है कि अराजक तत्व व्यवस्था की कमजोरियों का लाभ उठाकर देश के आंतरिक ढाँचे को अस्थिर करने की कोशिश करते हैं।

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वास्तविक समस्या यह है कि लंबित न्याय, नौकरशाही की हठधर्मी और प्रशासनिक ढिलाई के कारण आम नागरिक को हर स्तर पर अवरोधों का सामना करना पड़ता है। यही स्थिति सत्ता की साख को कमजोर करती है। भले ही सरकारें भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति की बात करती हैं, परंतु हकीकत यह है कि व्यवस्था के भीतर बैठे जिम्मेदार लोग ही इसे रोकने में विफल सिद्ध हो रहे हैं।

इस बढ़ते भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में सत्ता और विपक्ष से जुड़े कई जनप्रतिनिधियों व उनके सहयोगियों की भूमिका भी नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती। यही कारण है कि विश्व मंच पर भारत ज्ञान और कौशल से "विश्व गुरु" बनने की ओर अग्रसर होते हुए भी अपनी आंतरिक व्यवस्था को व्यवस्थित न कर पाने के कारण अराजक तत्वों की साज़िशों से जूझने के लिए विवश है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि स्वाधीन भारत के लोकतंत्र की रक्षा हेतु किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने के लिए गंभीर, ठोस और निरंतर प्रयास किए जाएँ। जब तक भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार नहीं होगा, तब तक देश को इससे उपजी अराजकता से मुक्ति नहीं मिल सकेगी।

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