सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बवाल: आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाने पर पशुप्रेमियों का विरोध
(मनोज कुमार अग्रवाल – विनायक फीचर्स) देशभर में आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और इंसानों को घायल करने की घटनाओं के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कड़ा रुख अपनाते हुए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) की सड़कों को आवारा कुत्तों से पूरी तरह मुक्त करने का आदेश दिया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने नगर निगमों को निर्देश दिया कि आठ हफ्तों के भीतर सभी कुत्तों को पकड़कर शेल्टर होम में रखा जाए, और उन्हें दोबारा सड़कों पर न छोड़ा जाए। अदालत ने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में कोई भी व्यक्ति या संगठन बाधा डालेगा, तो उसे अवमानना का सामना करना पड़ेगा।
आदेश पर बढ़ा विरोध
शीर्ष अदालत के इस फैसले पर पशुप्रेमियों और पशु अधिकार संगठनों ने कड़ा ऐतराज जताया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी ने इसे अव्यावहारिक और आर्थिक दृष्टि से असंभव बताया। उन्होंने कहा कि दिल्ली में लाखों कुत्तों को हटाने के लिए हजारों शेल्टर होम, पर्याप्त स्टाफ और भारी-भरकम बजट की जरूरत होगी, जो व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस कदम से पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ सकता है, जैसे अतीत में पेरिस में कुत्तों-बिल्लियों को हटाने के बाद चूहों का प्रकोप बढ़ गया था।
आंकड़ों से चिंता
अदालत में पेश आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में लगभग 10 लाख आवारा कुत्ते हैं, और सिर्फ पिछले वर्ष 68,000 लोगों को उन्होंने काटा। देशभर में कुत्तों की संख्या लगभग पांच करोड़ है, और रोज़ाना करीब 25,000 लोग इनके हमलों का शिकार बनते हैं। विश्व स्तर पर रैबीज़ से होने वाली मौतों में 36% मामले भारत में दर्ज होते हैं। हाल ही में कबड्डी खिलाड़ी ब्रजेश सोलंकी की कुत्ते के काटने के बाद रैबीज़ से दर्दनाक मौत ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया।
पशु अधिकार संगठनों की दलील
पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स इंडिया (PETA) ने भी फैसले का विरोध करते हुए कहा कि कुत्तों को जबरन हटाना वैज्ञानिक दृष्टि से गलत है और यह लंबे समय में समस्या का समाधान नहीं करेगा। संगठन का कहना है कि 2001 से सरकार ने नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रम को अनिवार्य किया है, लेकिन उसका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हुआ। यदि यह सही तरीके से लागू होता, तो सड़कों पर कुत्तों की संख्या काफी कम हो सकती थी।
कोर्ट का स्पष्ट संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि नसबंदी वाले और बिना नसबंदी वाले सभी कुत्तों को हटाया जाए, खासकर घनी आबादी वाले और संवेदनशील क्षेत्रों से। जरूरत पड़ने पर इसके लिए विशेष बल (स्पेशल फोर्स) भी गठित की जा सकती है। अदालत का मानना है कि फिलहाल प्राथमिकता सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित बनाने की है।
समाधान की राह
यह मुद्दा इंसान और जानवर, दोनों के सहअस्तित्व से जुड़ा है। एक ओर इंसानों की सुरक्षा जरूरी है, वहीं दूसरी ओर पशुओं के अधिकारों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का स्थायी हल तभी निकलेगा जब नगर निगम, सरकार और समाज मिलकर नसबंदी, टीकाकरण और पशु शेल्टर प्रबंधन को सख्ती से लागू करें।

