बिहार में एएनएम का मानदेय और स्वास्थ्य नीति की विसंगतियां
सोनी कुमारी — विभूति फीचर्स
बिहार के गांवों में स्वास्थ्य व्यवस्था की पहली दस्तक अक्सर डॉक्टर की नहीं, बल्कि एएनएम (ऑक्सिलरी नर्स मिडवाइफ) की होती है। गर्भवती महिलाओं की निगरानी हो, बच्चों का टीकाकरण, परिवार नियोजन की जानकारी या सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं को घर-घर पहुंचाना—एएनएम स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे अहम कड़ियों में शामिल है। अस्पताल और गांव के बीच वह एक ऐसा सेतु है, जिसके कमजोर पड़ने का सीधा असर अंततः मरीजों तक पहुंचता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की दूरी केवल किलोमीटर से तय नहीं होती। कच्ची सड़कें, बारिश, नदी-नाले और परिवहन के सीमित साधन इस दूरी को और बढ़ा देते हैं। ऐसे में एएनएम की भूमिका केवल स्वास्थ्य केंद्र तक सीमित नहीं रहती। उसे टोले-मोहल्लों और घरों तक पहुंचना होता है। मौसम अनुकूल हो या प्रतिकूल, टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की निगरानी और स्वास्थ्य कार्यक्रमों का क्रियान्वयन जारी रखना उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
लेकिन सवाल यह है कि स्वास्थ्य व्यवस्था की इस पहली कतार में खड़ी महिला के श्रम और भविष्य की सुरक्षा के लिए व्यवस्था में कितनी जगह है? 16 सितंबर को पटना में संविदा एएनएम कर्मियों का प्रदर्शन इसी सवाल को सामने लेकर आया। समान काम के लिए समान वेतन, मानदेय में वृद्धि और सेवा नियमित करने की मांग को लेकर कर्मियों ने प्रदर्शन किया। संघ के अनुसार, संविदा एएनएम को फिलहाल 15 हजार रुपये मासिक मानदेय मिलता है और उनकी मांग है कि मानदेय में वृद्धि के साथ सेवा नियमितीकरण की स्पष्ट नीति बनाई जाए तथा अनुभव का लाभ दिया जाए।
बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच मानदेय की समीक्षा जरूरी
समय के साथ एएनएम से जुड़ी जिम्मेदारियां भी बढ़ी हैं। फील्ड में जाकर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना, सरकारी कार्यक्रमों को लागू करना, लाभार्थियों का रिकॉर्ड रखना और विभागीय जवाबदेही निभाना उनके काम का हिस्सा है। ऐसे में मानदेय निर्धारित करते समय केवल स्थायी और संविदा कर्मचारी का अंतर ही पर्याप्त आधार नहीं होना चाहिए। काम की प्रकृति, जिम्मेदारी, योग्यता और अनुभव को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
सबसे पहले मानदेय को महंगाई से जोड़ने की जरूरत है। यदि मानदेय लंबे समय तक स्थिर रहता है और जीवन-यापन की लागत लगातार बढ़ती रहती है, तो वास्तविक रूप से उस आय का मूल्य कम होता जाता है। इसलिए मानदेय की समीक्षा किसी आंदोलन के बाद होने वाली प्रक्रिया न होकर निश्चित अंतराल पर होने वाली संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए।
दूसरा महत्वपूर्ण आधार सेवा-अवधि और अनुभव हो सकता है। यदि कोई एएनएम पांच या दस वर्षों से लगातार सेवाएं दे रही है, तो उसके अनुभव को नई नियुक्ति पाने वाली कर्मी के समान स्तर पर रखना अनुभव के महत्व को कम करता है। अनुभव आधारित प्रोत्साहन और पारिश्रमिक की व्यवस्था कर्मियों के मनोबल को भी प्रभावित कर सकती है।
दुर्गम क्षेत्रों के लिए अलग प्रोत्साहन की जरूरत
बिहार जैसे राज्य में सभी क्षेत्रों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। बाढ़ प्रभावित और दुर्गम इलाकों में काम करने वाली एएनएम को कई बार परिवहन, मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों से अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। दूसरी ओर, शहरी या अपेक्षाकृत सुगम क्षेत्रों में परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए कठिन क्षेत्रों में कार्यरत स्वास्थ्यकर्मियों के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।
समान काम के लिए पारिश्रमिक में अंतर का सवाल भी पारदर्शिता की मांग करता है। संविदा और स्थायी कर्मचारियों की सेवा-शर्तें अलग हो सकती हैं, इसलिए केवल यांत्रिक रूप से समानता लागू करना समाधान नहीं है। लेकिन जहां जिम्मेदारियां समान हैं, वहां सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पारिश्रमिक में अंतर किन नियमों और सेवा-शर्तों के आधार पर निर्धारित किया गया है।
मानदेय से आगे व्यापक स्वास्थ्य मानव संसाधन नीति
बिहार के लिए यह मुद्दा केवल मानदेय बढ़ाने की मांग तक सीमित न रहकर व्यापक स्वास्थ्य मानव संसाधन नीति की दिशा में जाने का अवसर बन सकता है। ऐसी नीति में मानदेय तय करने का स्पष्ट फार्मूला, समयबद्ध समीक्षा, अनुभव का महत्व, सामाजिक सुरक्षा और पारदर्शी पदस्थापन जैसे प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं।
प्रत्येक संविदा एएनएम का डिजिटल सेवा रिकॉर्ड तैयार करना भी उपयोगी कदम हो सकता है। इससे उसकी सेवा अवधि, अनुभव, प्रशिक्षण और कार्य से जुड़ी उपलब्धियों का व्यवस्थित रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा तथा भविष्य में सेवा संबंधी निर्णय लेते समय दस्तावेजी आधार मौजूद होगा।
यह प्रदर्शन केवल मानदेय बढ़ाने की मांग नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर विचार करने का अवसर भी है। सवाल यह है कि जिस स्वास्थ्य सेवा की जरूरत स्थायी है, उसे गांव-गांव पहुंचाने वाले कर्मियों का भविष्य लंबे समय तक अस्थायी क्यों रहे?
एएनएम को हर वर्ष अपने काम की उपयोगिता साबित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में उसकी भूमिका स्वयं उसके योगदान का प्रमाण है। यदि गांवों की स्वास्थ्य सेवाओं की पहली कड़ी को मजबूत करना है, तो एएनएम के हाथों में केवल जिम्मेदारियां नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य का भरोसा भी देना होगा।
(विभूति फीचर्स)
