अपने होने की पहचान की तलाश है ‘अस्मि’

‘Asmi’ is the search for one’s own identity.
 
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विवेक रंजन श्रीवास्तव — विनायक फीचर्स

किसी पुस्तक पर चर्चा करना केवल उसकी कथा सुनाना नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे विचारों, संवेदनाओं और जीवन-दृष्टि को समझने का प्रयास भी है। मेरे लिए शिखा वार्ष्णेय का उपन्यास ‘अस्मि’ ऐसी ही एक कृति है, जो एक स्त्री की कहानी के माध्यम से हमारे सामने एक बुनियादी प्रश्न रखता है—दूसरों के लिए जीते-जीते क्या स्त्रियां अपने लिए जीना भूल जाती हैं?

‘अस्मि’ का अर्थ है—‘मैं हूं’। यह छोटा-सा शब्द अपने भीतर एक व्यापक जीवन-दर्शन समेटे हुए है। जीवन में हम अनेक भूमिकाएं निभाते हैं। हम किसी के माता-पिता, जीवनसाथी, बेटे-बेटी या मित्र होते हैं। इन रिश्तों के साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं, लेकिन इन सबसे अलग हमारा अपना व्यक्तित्व भी होता है। हमारी अपनी इच्छाएं, रुचियां और सपने होते हैं। सवाल यह है कि क्या हम उन्हें पहचान पाते हैं और उन्हें जीने का अवसर दे पाते हैं? शिखा वार्ष्णेय का उपन्यास इन्हीं सवालों को अपनी कथा का आधार बनाता है।

शिखा वार्ष्णेय की लेखनी और स्त्री का आत्मसंघर्ष

शिखा वार्ष्णेय पत्रकारिता और साहित्य, दोनों क्षेत्रों से जुड़ी रही हैं। उन्होंने मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की पढ़ाई की। लंदन में रहते हुए भी उनका लेखन भारतीय पाठकों से निरंतर संवाद करता है। ‘अस्मि’ में उन्होंने स्त्री के भीतर चलने वाले उस द्वंद्व को स्वर दिया है, जो अक्सर परिवार और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच दबकर रह जाता है।

उपन्यास की केंद्रीय पात्र एला एक शिक्षित महिला है। उसका परिवार है, पति राजीव है और बेटा अंकुर है। बाहर से उसका जीवन सामान्य और व्यवस्थित दिखाई देता है, लेकिन भीतर वह अकेलेपन और मानसिक तनाव से जूझ रही है। परिवार की अपेक्षाओं को पूरा करते-करते उसकी अपनी रुचियां और इच्छाएं पीछे छूट गई हैं। उसकी पहचान धीरे-धीरे पत्नी और मां की भूमिकाओं तक सिमटने लगती है।

एला की यह स्थिति किसी एक व्यक्ति की कहानी भर नहीं है। यह उन अनेक महिलाओं के जीवन की ओर संकेत करती है, जो परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए अपने मन की आवाज सुनना भूल जाती हैं। उनकी अपनी आकांक्षाएं होती हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए समय और अवसर जुटाना कठिन हो जाता है।

एक दुर्घटना, जिसने बदल दी जीवन की दिशा

एला मानसिक तनाव और अवसाद के दौर से गुजर रही होती है। इसी बीच पैराग्लाइडिंग के दौरान हुई एक दुर्घटना उसके जीवन की दिशा बदल देती है। वह एक दूरस्थ पहाड़ी गांव में पहुंच जाती है। वहां के लोग उसके लिए अनजान हैं, फिर भी वे उसकी देखभाल करते हैं और उसे सहज होने का अवसर देते हैं।

इस गांव में एला धीरे-धीरे अपने भीतर लौटने लगती है। वह चित्र बनाती है, घरों और दीवारों को रंगों से सजाती है तथा बच्चों के साथ समय बिताती है। वनस्पति-विज्ञान का उसका ज्ञान भी गांव के लोगों के काम आता है। उसकी शिक्षा, प्रतिभा और रचनात्मकता अब केवल उसके निजी गुण नहीं रह जाते, बल्कि समुदाय के जीवन में उपयोगी भूमिका निभाने लगते हैं।

यह बदलाव महत्वपूर्ण है। जिस एला की पहचान पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच सीमित होती जा रही थी, वह अब अपने हुनर और रुचियों के माध्यम से स्वयं को नए सिरे से पहचानने लगती है। गांव का वातावरण उसे यह समझने का अवसर देता है कि जीवन का अर्थ केवल दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करना नहीं, बल्कि अपने भीतर मौजूद संभावनाओं को भी जगह देना है।

‘इकिगाई’ से मिला जीवन का उद्देश्य

गांव का अरलू एला को जापानी अवधारणा ‘इकिगाई’ से परिचित कराता है। सामान्य अर्थ में इकिगाई उस उद्देश्य या अर्थबोध को कहा जा सकता है, जो व्यक्ति को जीवन में आगे बढ़ने और हर सुबह उठने की प्रेरणा देता है।

एला के लिए चित्रकला और गांव के लोगों की सहायता ऐसे ही उद्देश्य बन जाते हैं। वह अपनी रुचियों के माध्यम से आनंद अनुभव करती है और दूसरों के जीवन में भी उपयोगी योगदान देती है। इस तरह उसके भीतर आत्मविश्वास और अपने अस्तित्व का बोध विकसित होने लगता है।

उपन्यास का यह हिस्सा हमें सोचने पर विवश करता है कि किसी व्यक्ति की खुशी केवल बाहरी सुविधाओं या सामाजिक मान्यता पर निर्भर नहीं करती। अपने काम में अर्थ खोजना, अपनी प्रतिभा को अभिव्यक्त करना और अपने निर्णयों में स्वतंत्रता अनुभव करना भी जीवन को सार्थक बना सकता है।

प्रेम और अधिकार के बीच का अंतर

कथा का वास्तविक संघर्ष तब सामने आता है, जब एला का बेटा अंकुर उसे खोजते हुए गांव पहुंचता है। वह चाहता है कि उसकी मां उसके साथ वापस लौट चले। स्वाभाविक रूप से उसके मन में मां के प्रति लगाव और उसे अपने पास रखने की इच्छा है। लेकिन गांव में कुछ समय बिताने के बाद वह एला की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने लगता है।

अंकुर देखता है कि उसकी मां यहां खुश है, अपनी रुचियों के साथ जुड़ी हुई है और अपने जीवन को एक नए अर्थ में जी रही है। अंततः वह उसके निर्णय का सम्मान करता है।

मेरी दृष्टि में उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है—प्रेम और अधिकार के बीच का अंतर। किसी से प्रेम करने का अर्थ हमेशा उसके निर्णयों को अपने अनुसार तय करना नहीं होता। सच्चा स्नेह दूसरे व्यक्ति की इच्छाओं, स्वतंत्रता और व्यक्तित्व को भी स्वीकार करने का साहस देता है।

एला का निर्णय रिश्तों की एक नई व्याख्या सामने रखता है। किसी स्त्री का मां या पत्नी होना उसकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है, लेकिन यही उसकी संपूर्ण पहचान नहीं है। उसके भीतर एक स्वतंत्र व्यक्ति भी मौजूद है, जिसकी अपनी इच्छाएं, रुचियां और सपने हैं।

स्त्री की पहचान केवल रिश्तों से नहीं बनती

‘अस्मि’ स्त्री की स्वतंत्रता को परिवार से अलग होने या रिश्तों को अस्वीकार करने के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय आत्मपहचान के प्रश्न से जोड़ता है। एला का अनुभव बताता है कि अपने लिए समय निकालना, अपनी रुचियों को महत्व देना और अपने जीवन के बारे में निर्णय लेना भी उतना ही आवश्यक है जितना परिवार के प्रति जिम्मेदारियों का निर्वहन करना।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की जरूरत है। आत्मखोज की यात्रा हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है। किसी के लिए वह कला हो सकती है, किसी के लिए शिक्षा, सामाजिक सेवा, प्रकृति से जुड़ाव या कोई अन्य रचनात्मक गतिविधि। महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पहचान सके और उन्हें जीवन में उचित स्थान दे सके।

शिवना प्रकाशन ने हिंदी की विभिन्न विधाओं के साथ प्रवासी लेखकों की रचनाओं को भी मंच दिया है। हिंदी साहित्य के विस्तार और विविध अनुभवों को पाठकों तक पहुंचाने में ऐसे प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

‘अस्मि’ का संदेश: मेरा अपना होना भी जरूरी है

शिखा वार्ष्णेय का उपन्यास ‘अस्मि’ पाठक को अपने जीवन और रिश्तों पर नए सिरे से विचार करने का अवसर देता है। यह पूछता है कि दूसरों के लिए अपनी जिम्मेदारियां निभाते हुए क्या हम अपने अस्तित्व को पर्याप्त महत्व देते हैं? क्या परिवार के प्रति प्रेम का अर्थ स्वयं को भुला देना है? और क्या किसी स्त्री को अपनी खुशी चुनने के लिए किसी असाधारण घटना की प्रतीक्षा करनी चाहिए?

इन सवालों के उत्तर हर व्यक्ति अपने अनुभवों के आधार पर खोज सकता है। उपन्यास का मूल भाव यही है कि दूसरों के जीवन में हमारी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन हमारा अपना अस्तित्व भी उतना ही मूल्यवान है।

‘अस्मि’ का सार शायद इसी विचार में निहित है—मैं दूसरों के लिए हूं, लेकिन मेरा अपना होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

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