आंटी पुलिस बुला लेगी, सारे काम करा लेगी... पत्नियों की ‘ना’ और पतियों के बर्तन मांजने का सच
लेखक: मुकेश "कबीर" (विभूति फीचर्स)
हाल ही में अखबार के पन्नों पर एक ऐसी अनोखी सुर्खी चमकी जिसने शादीशुदा मर्दों के दिल की धड़कनें बढ़ा दीं। खबर थी कि— "पति ने बर्तन मांजने से मना किया, तो पत्नी ने सीधे पुलिस बुला ली।"
अब इस खबर का सीधा और सीधा मतलब क्या निकलता है पाजी? मतलब साफ है कि आज के दौर में एक पति के लिए घर के बर्तन चमकाना उतना ही अनिवार्य (Compulsory) हो चुका है, जितना किसी टैक्सी ड्राइवर के लिए स्टीयरिंग थामना। गाड़ी चलानी है, तो चकरी घुमानी पड़ेगी; वर्ना सावधानी हटी और 'डायल 100' की दुर्घटना घटी!
आप सोच रहे होंगे कि कार की चकरी और सिंक में रखे बर्तनों का क्या कनेक्शन है? भैया, चकरी चाहे कोई भी हो, जब घूमती है तो अच्छे-अच्छों को चक्कर आ जाते हैं। शादी की शुरुआत भी तो फेरों के 'चक्कर' से ही होती है, तो फिर अब रुकना कैसा? चलते चलो... चाहे बर्तन घिसने पड़ें या साड़ी धोनी पड़े, कभी मना मत करो। किसी महान कवि ने शायद पतियों के लिए ही लिखा था— "चरैवेति चरैवेति... रुकना तेरा काम नहीं, चलना तेरी शान!" लगता है उस कवि ने भी अपने जीवन में जमकर विम बार का पराक्रम दिखाया होगा, तभी लिख गए— "इसमें तेरा गौरव है, इसमें तेरी आन!"
कुमारों की डिक्शनरी और पतियों का करंट
तो पतियों, कभी 'ना' कहने की भूल मत करना। याद रखो, पुरुषों की 'ना' का मतलब 'हाँ' नहीं होता; यह विशेष विशेषाधिकार सिर्फ नारी जाति को प्राप्त है। महान दार्शनिक ओशो ने भी कहा था कि— "अगर जीवन में तरक्की करनी है, तो 'ना' कहना सीखो।" लेकिन एक बात गांठ बांध लो, ओशो कुंवारे थे! ऐसे क्रांतिकारी विचार सिर्फ कुंवारों की डिक्शनरी में ही शोभा देते हैं क्योंकि उन्हें बर्तन नहीं, खुद का करियर मांजना होता है।
शादीशुदा भाइयों को कुंवारों की सलाह से उतना ही दूर रहना चाहिए, जितना पानी से बिजली को। माना कि पानी से ही बिजली बनती है, लेकिन एक बार बिजली बन जाने के बाद अगर वह वापस पानी से यारी करेगी, तो तगड़ा शॉर्ट-सर्किट होना तय है। इसलिए कुंवारों की बातों में आए, तो ऐसा झटका लगेगा कि जिया बेकरार हो जाएगा!
गीता का ज्ञान: सिर्फ कर्म करो, सुखाने की मत सोचो!
इस जन्म का कोटा चुपचाप और अच्छे से पूरा कर लो, बाकी का हिसाब-किताब अगले जनम में देख लिया जाएगा। आखिर सात जन्मों का फेरा है, इस चक्रव्यूह ने ऐसा घेरा है कि 'ना' बोलने की कोई गुंजाइश ही नहीं बची।
अगर गृहस्थी की गाड़ी को बिना किसी चालान के चलाना है, तो अपने हाथ चलाते रहो— कभी झाड़ू पर, कभी बर्तनों पर, तो कभी कपड़ों पर। और आज एक ऐसा 'गुप्त गुरुमंत्र' दे रहा हूँ जो कोई और नहीं बताएगा:
"जब भी घर में कपड़े या साड़ी धोएं, तो उन्हें धोकर बाथरूम में ही छोड़ दें। उन्हें बाहर बालकनी या छत पर सुखाने की गलती भूलकर भी न करें।"
कपड़े सुखाने का यह पराक्रम सिर्फ और सिर्फ घर की 'मालकिन' का होता है। उनके इस अधिकार क्षेत्र में अड़ंगा कतई न लगाएं, वर्ना फिर वही डर... आंटी पुलिस बुला लेगी!
समझ गए न हे पार्थ? तुम्हारा अधिकार सिर्फ कपड़े धोने (कर्म करने) में है, उन्हें सुखाने (फल की इच्छा) में नहीं। काम को छोटा या बड़ा मत समझो; सुख-दुख, लाभ-हानि को समान समझकर बस लगे रहो— बिना थके, बिना रुके और बिना पिटे।आखिर में बस इतना याद रखो कि विम बार में सौ नीबुओं की शक्ति है और अगर शादी चलानी है, तो सर्फ एक्सेल के दाग वाकई अच्छे हैं!

