आंटी पुलिस बुला लेगी, सारे काम करा लेगी... पत्नियों की ‘ना’ और पतियों के बर्तन मांजने का सच

Aunty will call the police and get all the work done... The truth about wives' 'no' and husbands' washing utensils.
 
पेट्रोल मूल्य वृद्धि का विरोधाभास: संकट जनता का, कमाई सरकार की (भूपेन्द्र गुप्ता-विभूति फीचर्स)            भारत में पेट्रोल की बढ़ती कीमतें अब केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कहानी नहीं रह गई हैं। वे सरकारों की उस आर्थिक संरचना का प्रतीक बन चुकी हैं जिसमें ईंधन उपभोक्ता की आवश्यकता कम और राजस्व का सबसे भरोसेमंद स्रोत अधिक दिखाई देता है। आज जब ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया के तनाव के कारण पेट्रोल की कीमतें फिर बढ़ रही हैं, तब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में जनता केवल वैश्विक संकट का बोझ उठा रही है, या फिर उस कर-व्यवस्था का भी भार झेल रही है जिसने ईंधन को राजस्व मशीन बना दिया है?        भारत जैसे देश में, जहाँ करोड़ों लोग प्रत्यक्ष कर दायरे में नहीं आते, पेट्रोल-डीजल पर लगाया गया टैक्स सरकारों के लिए सबसे आसान आय का साधन बन गया है। उपभोक्ता हर दिन, हर लीटर के साथ टैक्स देता है,बिना किसी बहस, नोटिस या प्रतिरोध के। यही कारण है कि पेट्रोल की कीमत अब केवल ऊर्जा लागत से तय नहीं होती, उसमें सरकारों की राजकोषीय भूख भी शामिल होती है। वर्तमान मूल्य वृद्धि इसी विरोधाभास को उजागर करती है। सरकारें कह रही हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महँगा हो गया है, इसलिए कीमतें बढ़ना स्वाभाविक है। यह तर्क भी आंशिक रूप से ही सही  है।        भारत लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक संकटों का असर यहाँ पड़ना तय है। लेकिन सवाल यह है कि जब कच्चा तेल सस्ता हुआ था तब जनता को उसी अनुपात में राहत क्यों नहीं मिली?        कोविड काल और उसके बाद कई महीनों तक अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें ऐतिहासिक रूप से नीचे चली गई थीं। उस समय जनता को उम्मीद थी कि पेट्रोल-डीजल सस्ते होंगे,लेकिन हुआ उल्टा। केंद्र सरकार ने एक्साईज ड्यूटी बढ़ाई, और राज्यों ने वैट(मूल्य वर्धित टैक्स) बनाए रखा और पेट्रोल के दाम ऊँचे ही बने रहे। सरकारों का राजस्व बढ़ता गया, जबकि उपभोक्ता राहत की प्रतीक्षा करता रहा। यहीं से “ऊर्जा लागत मॉडल” और “राजस्व मॉडल” का अंतर स्पष्ट होता है।         ऊर्जा लागत मॉडल कहता है कि ईंधन की कीमत मुख्यतः तेल की वास्तविक लागत से तय होनी चाहिए। लेकिन राजस्व मॉडल में ईंधन सरकार के बजट संतुलन का उपकरण बन जाता है। भारत में धीरे-धीरे यही हुआ है। आज भी पेट्रोल की कीमत का बड़ा हिस्सा टैक्स है। यदि पेट्रोल का वास्तविक बेस प्राइस लगभग ₹ 55 से 60 प्रति लीटर है, तो उपभोक्ता पंप पर ₹110 के आसपास भुगतान करता है। यानी वह केवल पेट्रोल नहीं खरीद रहा है, बल्कि भारी कर-व्यवस्था का वित्त पोषण भी खरीद रहा है। सबसे बड़ा विरोधाभास तब दिखाई देता है जब सरकारें एक ओर जनता से खर्च कम करने, सादगी अपनाने और वैश्विक संकट सहने की अपील करती हैं, वहीं दूसरी ओर पेट्रोल-डीजल को राजस्व संग्रह के स्थायी साधन की तरह इस्तेमाल करती रहती हैं। यदि वास्तव में संकट साझा है, तो उसका बोझ केवल उपभोक्ता पर क्यों डाला जाए? टैक्स संरचना में स्वतः कमी क्यों नहीं आती?        यह भी ध्यान देने योग्य है कि पेट्रोल-डीजल पर टैक्स एक प्रतिगामी कर (रिग्रेसिव टैक्स) की तरह काम करता है। अमीर और गरीब दोनों एक लीटर पेट्रोल पर लगभग समान टैक्स देते हैं। लेकिन उसका वास्तविक बोझ गरीब और मध्यवर्ग पर अधिक पड़ता है। डीजल महँगा होते ही परिवहन महँगा होता है, और फिर खाद्यान्न से लेकर निर्माण सामग्री तक सबकी कीमतें बढ़ जाती हैं। यानी ईंधन मूल्य वृद्धि केवल वाहन चलाने वालों की समस्या नहीं रहती , वह पूरी अर्थव्यवस्था में महँगाई का दबाव पैदा करती है। सरकारों का तर्क है कि इसी राजस्व से सड़कें बनती हैं, कल्याणकारी योजनाएँ चलती हैं और राजकोषीय घाटा नियंत्रित होता है। यह तर्क पूरी तरह गलत नहीं है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या जनता को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार राहत दे, तब उसका लाभ सीधे उपभोक्ता तक पहुँचे? और यदि संकट के समय जनता से त्याग अपेक्षित है, तो क्या सरकारों को भी अपने कर ढाँचे में लचीलापन नहीं दिखाना चाहिए?        वर्तमान पेट्रोल मूल्य वृद्धि केवल एक आर्थिक घटना नहीं है, यह उस नीति-दर्शन का प्रतिबिंब है जिसमें ईधन को जीवन की आवश्यकता कम और राजस्व के अवसर के रूप में अधिक देखा जाने लगा है। जब तक पेट्रोल-डीजल को स्थायी कर-स्रोत की तरह इस्तेमाल किया जाता रहेगा, तब तक हर वैश्विक संकट का पहला और सबसे भारी असर आम भारतीय नागरिक की जेब पर ही पड़ेगा। (विभूति फीचर्स)

लेखक: मुकेश "कबीर" (विभूति फीचर्स)

हाल ही में अखबार के पन्नों पर एक ऐसी अनोखी सुर्खी चमकी जिसने शादीशुदा मर्दों के दिल की धड़कनें बढ़ा दीं। खबर थी कि— "पति ने बर्तन मांजने से मना किया, तो पत्नी ने सीधे पुलिस बुला ली।"

अब इस खबर का सीधा और सीधा मतलब क्या निकलता है पाजी? मतलब साफ है कि आज के दौर में एक पति के लिए घर के बर्तन चमकाना उतना ही अनिवार्य (Compulsory) हो चुका है, जितना किसी टैक्सी ड्राइवर के लिए स्टीयरिंग थामना। गाड़ी चलानी है, तो चकरी घुमानी पड़ेगी; वर्ना सावधानी हटी और 'डायल 100' की दुर्घटना घटी!

आप सोच रहे होंगे कि कार की चकरी और सिंक में रखे बर्तनों का क्या कनेक्शन है? भैया, चकरी चाहे कोई भी हो, जब घूमती है तो अच्छे-अच्छों को चक्कर आ जाते हैं। शादी की शुरुआत भी तो फेरों के 'चक्कर' से ही होती है, तो फिर अब रुकना कैसा? चलते चलो... चाहे बर्तन घिसने पड़ें या साड़ी धोनी पड़े, कभी मना मत करो। किसी महान कवि ने शायद पतियों के लिए ही लिखा था— "चरैवेति चरैवेति... रुकना तेरा काम नहीं, चलना तेरी शान!" लगता है उस कवि ने भी अपने जीवन में जमकर विम बार का पराक्रम दिखाया होगा, तभी लिख गए— "इसमें तेरा गौरव है, इसमें तेरी आन!"

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कुमारों की डिक्शनरी और पतियों का करंट

तो पतियों, कभी 'ना' कहने की भूल मत करना। याद रखो, पुरुषों की 'ना' का मतलब 'हाँ' नहीं होता; यह विशेष विशेषाधिकार सिर्फ नारी जाति को प्राप्त है। महान दार्शनिक ओशो ने भी कहा था कि— "अगर जीवन में तरक्की करनी है, तो 'ना' कहना सीखो।" लेकिन एक बात गांठ बांध लो, ओशो कुंवारे थे! ऐसे क्रांतिकारी विचार सिर्फ कुंवारों की डिक्शनरी में ही शोभा देते हैं क्योंकि उन्हें बर्तन नहीं, खुद का करियर मांजना होता है।

शादीशुदा भाइयों को कुंवारों की सलाह से उतना ही दूर रहना चाहिए, जितना पानी से बिजली को। माना कि पानी से ही बिजली बनती है, लेकिन एक बार बिजली बन जाने के बाद अगर वह वापस पानी से यारी करेगी, तो तगड़ा शॉर्ट-सर्किट होना तय है। इसलिए कुंवारों की बातों में आए, तो ऐसा झटका लगेगा कि जिया बेकरार हो जाएगा!

गीता का ज्ञान: सिर्फ कर्म करो, सुखाने की मत सोचो!

इस जन्म का कोटा चुपचाप और अच्छे से पूरा कर लो, बाकी का हिसाब-किताब अगले जनम में देख लिया जाएगा। आखिर सात जन्मों का फेरा है, इस चक्रव्यूह ने ऐसा घेरा है कि 'ना' बोलने की कोई गुंजाइश ही नहीं बची।

अगर गृहस्थी की गाड़ी को बिना किसी चालान के चलाना है, तो अपने हाथ चलाते रहो— कभी झाड़ू पर, कभी बर्तनों पर, तो कभी कपड़ों पर। और आज एक ऐसा 'गुप्त गुरुमंत्र' दे रहा हूँ जो कोई और नहीं बताएगा:

"जब भी घर में कपड़े या साड़ी धोएं, तो उन्हें धोकर बाथरूम में ही छोड़ दें। उन्हें बाहर बालकनी या छत पर सुखाने की गलती भूलकर भी न करें।"

कपड़े सुखाने का यह पराक्रम सिर्फ और सिर्फ घर की 'मालकिन' का होता है। उनके इस अधिकार क्षेत्र में अड़ंगा कतई न लगाएं, वर्ना फिर वही डर... आंटी पुलिस बुला लेगी!

समझ गए न हे पार्थ? तुम्हारा अधिकार सिर्फ कपड़े धोने (कर्म करने) में है, उन्हें सुखाने (फल की इच्छा) में नहीं। काम को छोटा या बड़ा मत समझो; सुख-दुख, लाभ-हानि को समान समझकर बस लगे रहो— बिना थके, बिना रुके और बिना पिटे।आखिर में बस इतना याद रखो कि विम बार में सौ नीबुओं की शक्ति है और अगर शादी चलानी है, तो सर्फ एक्सेल के दाग वाकई अच्छे हैं!

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