आयुष्मान का भरोसा या व्यवस्था की भूलभुलैया?
पाँच लाख रुपये तक के स्वास्थ्य सुरक्षा कवच का दावा, लेकिन इलाज के समय पात्रता, पैकेज और स्वीकृति की प्रक्रियाओं में उलझता मरीज
डॉ. दीपक गोस्वामी – विनायक फीचर्स
भारत में गरीब और जरूरतमंद परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना शुरू की गई थी। इस योजना के तहत पात्र परिवारों को प्रति वर्ष पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य सुरक्षा कवर देने का प्रावधान है। सुनने में यह व्यवस्था किसी बड़े सहारे से कम नहीं लगती। उम्मीद यही है कि बीमारी के समय गरीब परिवार को इलाज के खर्च की चिंता न करनी पड़े। लेकिन सवाल यह है कि अस्पताल पहुंचने के बाद इस भरोसे की वास्तविक स्थिति क्या होती है? क्या मरीज को समय पर उपचार मिल पाता है या उसे कार्ड, पात्रता, उपचार पैकेज, स्वीकृति और भुगतान जैसी प्रक्रियाओं के बीच भटकना पड़ता है?
अक्सर ऐसी शिकायतें सामने आती हैं कि गंभीर परेशानी में अस्पताल पहुंचे मरीज के परिजन आयुष्मान कार्ड दिखाते हैं, लेकिन उन्हें पहले पात्रता जांच, उपचार पैकेज की पुष्टि और स्वीकृति जैसी प्रक्रियाओं से गुजरने को कहा जाता है। कुछ मामलों में ये औपचारिकताएं नियमानुसार आवश्यक हो सकती हैं, लेकिन कहीं लापरवाही या अनुचित वसूली की शिकायत भी सामने आ सकती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि संकट की घड़ी में मरीज का उपचार सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है? यदि किसी पात्र मरीज से नियमों के विरुद्ध पैसे मांगे जाते हैं, तो तत्काल जवाबदेही कौन तय करेगा?
आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की शुरुआत वर्ष 2018 में हुई थी। इसका उद्देश्य पात्र परिवारों को सूचीबद्ध अस्पतालों में निर्धारित शर्तों के तहत प्रति वर्ष पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य सुरक्षा कवर उपलब्ध कराना है। यह कोई नकद राशि नहीं है, जिसे लाभार्थी अपनी इच्छानुसार खर्च कर सके। इसके उपयोग के लिए पात्रता, अस्पताल की संबद्धता और निर्धारित उपचार पैकेज जैसी शर्तें लागू होती हैं। हालांकि, इन प्रक्रियाओं की जटिलता का पूरा बोझ उस मरीज या उसके परिवार पर नहीं डाला जाना चाहिए, जो इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचता है।
योजना के क्रियान्वयन और निगरानी को लेकर भी गंभीर सवाल उठते रहे हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की वर्ष 2023 की प्रदर्शन लेखापरीक्षा में योजना की सूचना-प्रणाली और दावों से जुड़ी कई अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में मृत दर्ज लाभार्थियों से संबंधित 3,903 दावों के बदले लगभग 6.97 करोड़ रुपये के भुगतान का मामला भी सामने आया। यह तथ्य पूरी योजना को धोखाधड़ी घोषित करने का आधार नहीं है, लेकिन इससे व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर सवाल जरूर खड़े होते हैं।
यह जानना जरूरी है कि ऐसे संदिग्ध दावों की पहचान किस प्रक्रिया से हुई, भुगतान से पहले सत्यापन की क्या व्यवस्था थी, गलत भुगतान की वसूली कहां तक पहुंची और भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए क्या सुधार किए गए? सार्वजनिक धन का गलत भुगतान हो या किसी पात्र मरीज को योजना का लाभ न मिलना, दोनों ही जवाबदेही के विषय हैं। दावों का सत्यापन मजबूत होना चाहिए और जानबूझकर नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध प्रमाणों के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही प्रशासनिक चूक और प्रमाणित धोखाधड़ी के बीच अंतर करना भी जरूरी है।
दूसरी ओर, अस्पतालों की आर्थिक स्थिति और योजना के तहत मिलने वाले भुगतान का सवाल भी महत्वपूर्ण है। अस्पतालों को चिकित्सकों, नर्सों, चिकित्सा उपकरणों, दवाओं, बिजली, तकनीकी सुविधाओं और चौबीस घंटे उपलब्ध सेवाओं पर खर्च करना पड़ता है। यदि निर्धारित उपचार पैकेज की दरें वास्तविक लागत के अनुरूप नहीं हैं या दावों के भुगतान में अनावश्यक देरी होती है, तो योजना में अस्पतालों की भागीदारी प्रभावित हो सकती है। यह समस्या हो सकती है, लेकिन इसका समाधान मरीज से मनमानी रकम वसूलना नहीं हो सकता।
यदि पैकेज की दरें अपर्याप्त हैं, तो वास्तविक लागत के आधार पर उनकी समीक्षा की जानी चाहिए। भुगतान लंबित हैं, तो दावों का समयबद्ध निपटारा होना चाहिए। यदि अस्पताल योजना से बाहर हो रहे हैं, तो उसके कारण सार्वजनिक किए जाने चाहिए। वहीं, किसी अस्पताल द्वारा पात्र मरीज से अनुचित भुगतान मांगने की शिकायत मिलती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। मरीज को अस्पताल और सरकार के बीच भुगतान संबंधी विवाद का बंधक नहीं बनाया जा सकता।
दवाओं और चिकित्सा सामग्री की कीमतों में पारदर्शिता भी स्वास्थ्य सेवाओं का अहम मुद्दा है। यदि किसी दवा की खरीद कीमत और मरीज से वसूले गए शुल्क में बड़ा अंतर दिखाई देता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले दवा की सही पहचान, खरीद का प्रमाण, अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP), सेवा शुल्क और लागू नियमों की जांच जरूरी है। हर मूल्य-अंतर अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं होता, लेकिन हर ऊंचे बिल को बिना जांच उचित भी नहीं माना जा सकता।
27 अक्टूबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में दवाओं और चिकित्सा सामग्री की कीमतों में अंतर से जुड़े विषय पर हुई सुनवाई ने स्वास्थ्य सेवाओं में मूल्य-पारदर्शिता की बहस को फिर प्रमुखता दी। इस तरह की सुनवाई के आधार पर किसी एक अस्पताल या पूरे चिकित्सा क्षेत्र के विरुद्ध निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन यह जरूर स्पष्ट होता है कि दवाओं और चिकित्सा सामग्री के मूल्य निर्धारण तथा मरीजों से लिए जाने वाले शुल्क पर पारदर्शी व्यवस्था आवश्यक है।
अस्पताल के बिल में दवाओं और चिकित्सा सामग्री का स्पष्ट विवरण होना चाहिए। जहां नियम लागू हों, वहां निर्धारित मूल्य-सीमाओं का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। मरीजों को अनावश्यक जांच, अस्पष्ट शुल्क और अनुचित खरीद के दबाव से बचाने के लिए प्रभावी निगरानी जरूरी है। अस्पतालों की आर्थिक जरूरतों पर चर्चा हो सकती है, लेकिन मरीज को पूरी जानकारी दिए बिना उससे भुगतान कराना स्वीकार्य व्यवस्था नहीं हो सकती।
समस्या केवल अस्पताल के काउंटर तक सीमित नहीं है। योजना के संचालन से जुड़ी एजेंसियां, राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण, अस्पताल प्रशासन, बीमा अथवा दावा प्रबंधन से जुड़ी संस्थाएं और शिकायतों की निगरानी करने वाले अधिकारी, सभी की अपनी जिम्मेदारियां हैं। यदि शिकायत दर्ज कराने के बाद मरीज को बार-बार वही दस्तावेज जमा करने पड़ें, एक विभाग दूसरे विभाग की जिम्मेदारी बताकर पल्ला झाड़ ले और शिकायत का अंतिम निस्तारण न हो, तो जवाबदेही केवल कागजों तक सीमित रह जाती है।
इसलिए सुधार की दिशा भी स्पष्ट होनी चाहिए। अस्पतालों में पात्रता और उपचार पैकेज की जानकारी सरल भाषा में प्रदर्शित की जाए। यदि किसी मरीज को उपचार देने से इनकार किया जाता है, तो उसका कारण लिखित रूप में बताया जाए। शिकायत दर्ज होने पर मरीज को पावती मिले और वह अपनी शिकायत की स्थिति जान सके। संदिग्ध दावों का नियमित लेखापरीक्षण हो। गलत भुगतान की वसूली और अनुचित वसूली से प्रभावित मरीजों को राहत देने की कार्रवाई भी सार्वजनिक की जाए। इसी तरह अस्पतालों के वैध भुगतान में देरी होने पर संबंधित जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
मरीजों और उनके परिजनों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना चाहिए। आयुष्मान कार्ड, उपचार से जुड़े दस्तावेज, अस्पताल का नाम, बिल, रसीद और भुगतान के प्रमाण सुरक्षित रखने चाहिए। यदि पात्र उपचार से इनकार किया जाता है या अनुचित रकम मांगी जाती है, तो अस्पताल के आयुष्मान सहायता केंद्र से लिखित स्पष्टीकरण मांगना चाहिए। राष्ट्रीय हेल्पलाइन 14555 पर शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। इसके अतिरिक्त संबंधित जिला या राज्य स्वास्थ्य एजेंसी से भी संपर्क किया जा सकता है। शिकायत करते समय घटना की तारीख, संबंधित तथ्य और उपलब्ध दस्तावेज देना चाहिए तथा शिकायत की पावती सुरक्षित रखनी चाहिए। हालांकि, आपातकालीन स्थिति में शिकायत या दस्तावेज जुटाने के कारण जरूरी उपचार में देरी नहीं होनी चाहिए।
सरकार और योजना के संचालन से जुड़ी एजेंसियों से भी कुछ सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए। पात्र मरीजों को उपचार से इनकार किए जाने की कितनी शिकायतें मिलीं? उनमें से कितनी सही पाई गईं? कितने मामलों में मरीजों को राहत मिली? गलत दावों के तहत भुगतान की गई कितनी राशि वापस वसूली गई? अस्पतालों के भुगतान में औसतन कितनी देरी हो रही है? शिकायतकर्ता को अंतिम निर्णय की जानकारी कितने समय में दी जाती है? इन सवालों के जवाब केवल दावों और घोषणाओं से नहीं, बल्कि सार्वजनिक आंकड़ों और स्वतंत्र जांच के माध्यम से सामने आने चाहिए।
किसी सरकारी योजना की आलोचना करना उसे कमजोर करना नहीं है। उसकी कमियों को उजागर करना उसे अधिक प्रभावी बनाने का रास्ता है। आयुष्मान योजना के माध्यम से जिन परिवारों को इलाज का लाभ मिला है, उनकी उपलब्धि और राहत को कम करके नहीं आंका जा सकता। लेकिन जहां पात्र मरीज को लाभ नहीं मिल पाता, वहां योजना की सफलता के आंकड़ों के आधार पर उसकी शिकायत को खारिज करना भी उचित नहीं है। केवल आयुष्मान कार्ड जारी कर देना स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी नहीं है। वास्तविक सुरक्षा तब है, जब बीमारी के समय मरीज को अपने अधिकार के लिए संघर्ष न करना पड़े।
एक गरीब परिवार के लिए अस्पताल का बिल केवल रुपये-पैसे का हिसाब नहीं होता। उसमें बच्चे की पढ़ाई, घर का राशन, वर्षों की बचत और कभी-कभी लंबे समय तक चुकाया जाने वाला कर्ज भी शामिल होता है। इसलिए स्वास्थ्य नीति और उसके क्रियान्वयन में यह समझना जरूरी है कि अस्पष्ट नियमों, भुगतान में देरी और अनुचित वसूली का सबसे ज्यादा बोझ उसी परिवार पर पड़ता है, जिसके पास विकल्प सबसे कम होते हैं।
आयुष्मान कार्ड को न तो चमत्कारी समाधान मानना चाहिए और न ही बेकार कागज का टुकड़ा। इसे ऐसा प्रभावी स्वास्थ्य सुरक्षा साधन बनाना होगा, जिसका लाभ हर पात्र नागरिक तक वास्तव में पहुंचे। सरकार को अपने वादों के क्रियान्वयन का हिसाब देना होगा, अस्पतालों को अपनी सेवाओं और शुल्क में पारदर्शिता रखनी होगी तथा शिकायत निवारण व्यवस्था को समयबद्ध, निष्पक्ष और परिणामकारी बनाना होगा।
जिस दिन पात्र मरीज को उपचार पाने के लिए अस्पताल के काउंटर पर अपनी विवशता साबित नहीं करनी पड़ेगी, जिस दिन अनुचित वसूली की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई होगी और जिस दिन योजना के प्रत्येक रुपये का हिसाब जनता के सामने होगा, उसी दिन पांच लाख रुपये का स्वास्थ्य सुरक्षा कवच कागज से निकलकर जीवन की वास्तविक सुरक्षा बन सकेगा।
