सेवानिवृत्ति के उपरांत बदल जाता है व्यवहार, अपनों की उपेक्षा सबसे अधिक चुभती है
डॉ. सुधाकर आशावादी — विनायक फीचर्स
सेवानिवृत्ति जीवन का एक ऐसा पड़ाव है, जहां व्यक्ति वर्षों की सेवा के बाद अपने अनुभवों के साथ नई दिनचर्या में प्रवेश करता है। लेकिन कई बार नौकरी से विदाई के साथ ही लोगों के व्यवहार में भी बदलाव दिखाई देने लगता है। जो सहकर्मी कभी सम्मान देते थे, वही दूरी बनाने लगते हैं। इसी सामाजिक सच्चाई को उजागर करती है डॉ. सुधाकर आशावादी की यह विचारोत्तेजक कहानी।
सेवानिवृत्त होने के बाद जब मैं महाविद्यालय पहुंचा, तो कुछ आत्मीय साथियों ने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। वहीं, कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने मुझे उपेक्षित नजरों से देखा और दूरी बना ली। शिक्षा संकाय के अध्यक्ष प्रोफेसर सिद्धार्थ के विभाग में पहुंचा तो वे बैठते ही बोले, “परिमल बाबू, और बताइए, सेवानिवृत्ति के बाद कैसा महसूस कर रहे हैं?”
मैंने मुस्कराते हुए जवाब दिया, “सिद्धार्थ जी, आप भी इसी वर्ष सेवानिवृत्त होने वाले हैं। सेवानिवृत्ति के बाद के अनुभव आपको भी होंगे, तब इस विषय पर विस्तार से चर्चा कर लेंगे।” मेरी बात सुनकर वे खिलखिलाकर हंसे और बोले, “लगता है, आपको कुछ तल्ख अनुभव हुए हैं।”
मैंने कहा, “सिद्धार्थ जी, अभी आप हंस रहे हैं, लेकिन सेवानिवृत्ति से पहले ही आपको कुछ विशेष अनुभव होने लगेंगे। एक अध्यापक की नजर से जब आप दूसरों के व्यवहार में आए बदलाव को बारीकी से देखेंगे, तो सच्चाई पहले ही सामने आने लगेगी।”
“मतलब, आप क्या कहना चाहते हैं?” प्रोफेसर सिद्धार्थ ने पूछा।
मैंने समझाया, “मतलब यह कि सेवानिवृत्ति की तारीख नजदीक आते ही आपके अधीनस्थ आपके आदेशों की अवहेलना करना शुरू कर सकते हैं। जिस पद पर बैठकर आप कभी निर्देश देते थे, उसी पद पर आपका अधीनस्थ बैठने लगेगा और आप उसके सामने एक सामान्य कर्मचारी की तरह बैठेंगे। उस समय आपको कैसा महसूस होगा? इतना ही नहीं, जो कर्मचारी आपको देखकर सम्मानपूर्वक प्रणाम करते थे, वे भी आपकी उपेक्षा करने लग सकते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद स्थिति और अधिक कष्टदायक हो सकती है, जब प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर कार्यालय के कर्मचारी तक आपको नजरअंदाज करने लगें।”
मेरी बात सुनकर प्रोफेसर सिद्धार्थ ने असहमति जताई। उन्होंने कहा, “आप क्या कह रहे हैं? क्या वास्तव में ऐसा होता है? मुझे विश्वास नहीं होता। यह तो व्यक्ति के व्यवहार पर निर्भर करता है। यदि आपने दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार किया होगा, तो बदले में अच्छा व्यवहार ही मिलेगा।”
मैंने उनकी बात सुनी, लेकिन समय को अपना उत्तर देने दिया।
छह महीने बाद बाजार में हुई मुलाकात
आखिरकार प्रोफेसर सिद्धार्थ भी सेवानिवृत्त हो गए। करीब छह महीने बाद एक दिन बाजार में उनसे मुलाकात हो गई। उनके हाथ में थैला था और वे सब्जियां खरीद रहे थे। मुझे देखते ही वे बोले, “परिमल जी, आप सही कह रहे थे। सेवानिवृत्ति के बाद लोगों का व्यवहार कितना बदल जाता है, इसकी वास्तविकता तो नौकरी से विदा होने के बाद ही समझ में आती है।”
उन्होंने आगे कहा, “सेवानिवृत्ति के बाद अपने ही साथियों का व्यवहार देखकर आश्चर्य होता है। ऐसा लगता है, मानो सेवानिवृत्त कर्मचारियों की उपेक्षा करने वाले सेवारत अधिकारी और कर्मचारी कभी खुद सेवानिवृत्त होंगे ही नहीं।”
उनकी बातों में अब पहले वाली हंसी नहीं थी, बल्कि अनुभव से उपजी पीड़ा थी।
पद के साथ नहीं, व्यक्ति के साथ होना चाहिए सम्मान
सेवानिवृत्ति के बाद व्यक्ति का पद और अधिकार भले ही समाप्त हो जाएं, लेकिन उसका अनुभव, योगदान और मानवीय गरिमा समाप्त नहीं होते। वर्षों तक किसी संस्थान को अपनी सेवाएं देने वाले व्यक्ति के प्रति सम्मान केवल उसके पद तक सीमित नहीं होना चाहिए।
यह कहानी हमें सोचने पर विवश करती है कि क्या हमारा सम्मान किसी व्यक्ति के अनुभव और व्यक्तित्व के लिए होता है या केवल उसके पद और अधिकारों के लिए? यदि व्यवहार पद के साथ बदल जाता है, तो यह हमारे सामाजिक मूल्यों पर भी प्रश्न खड़ा करता है।
डॉ. सुधाकर आशावादी की यह रचना याद दिलाती है कि पद अस्थायी होता है, लेकिन मानवीय संवेदना और सम्मान स्थायी मूल्य हैं। आज जो व्यक्ति सेवानिवृत्त हुआ है, कल हमारी भी बारी आएगी। इसलिए दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार करें, जैसा व्यवहार हम स्वयं अपने जीवन के उस पड़ाव पर पाना चाहेंगे।
