पर्यावरण से आगे भारत के विकास का बड़ा अवसर ‘कार्बन क्रेडिट’
'Carbon Credit' is a big opportunity for India's development beyond the environment.
Wed, 25 Feb 2026
– Dr. Atul Malikram, राजनीतिक रणनीतिकार आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती का सामना कर रही है। बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, चरम मौसमी घटनाएँ और प्राकृतिक आपदाएँ अब असामान्य नहीं रहीं। ऐसे समय में ‘कार्बन क्रेडिट’ की अवधारणा केवल पर्यावरणीय बहस का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक अवसर के रूप में उभर रही है।
सरल शब्दों में, कार्बन क्रेडिट एक प्रकार का प्रमाण-पत्र है। जब कोई देश, कंपनी या परियोजना वातावरण में जाने वाले एक टन कार्बन डाइऑक्साइड या समतुल्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करती है, तो उसे एक कार्बन क्रेडिट प्राप्त होता है। इस वैश्विक व्यवस्था की शुरुआत 1997 के Kyoto Protocol से हुई और 2015 के Paris Agreement के बाद यह और व्यापक हो गई। इसका मूल सिद्धांत स्पष्ट है—जो प्रदूषण कम करे, उसे आर्थिक लाभ; जो अधिक प्रदूषण करे, उसे उसकी कीमत चुकानी पड़े
वैश्विक बाजार और बदलते व्यापार नियम
आज कार्बन क्रेडिट एक वैश्विक बाजार का रूप ले चुका है। कई देश अपने व्यापार नियमों में पर्यावरणीय मानकों को शामिल कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, European Union ने ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट’ जैसी व्यवस्था लागू करनी शुरू की है। इसका अर्थ है कि यदि किसी देश में उत्पादन प्रक्रिया अधिक प्रदूषणकारी है, तो उसके निर्यात पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। भविष्य में भारतीय उद्योगों को भी अपने उत्पादों की पर्यावरण-अनुकूलता प्रमाणित करनी होगी।
भारत के लिए रणनीतिक अवसर
भारत लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि ऐतिहासिक रूप से विकसित देशों ने अधिक उत्सर्जन किया है, इसलिए विकासशील देशों पर समान दायित्व डालना न्यायसंगत नहीं। यह दृष्टिकोण उचित है, परंतु साथ ही यह भी सच है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था ‘ग्रीन’ दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसे में कार्बन क्रेडिट को अवसर के रूप में देखना व्यावहारिक और दूरदर्शी कदम होगा।
1. किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत
खेती जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है, लेकिन यही क्षेत्र नई आय का माध्यम भी बन सकता है। यदि किसान ड्रिप सिंचाई अपनाएँ, फसल अवशेष न जलाएँ, जैविक खाद का प्रयोग बढ़ाएँ, मिट्टी में कार्बन संरक्षण की तकनीक अपनाएँ या सोलर पंप लगाएँ, तो वे कार्बन क्रेडिट अर्जित कर सकते हैं। इससे उनकी आय केवल फसल तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के बदले अतिरिक्त कमाई भी संभव होगी।
2. एमएसएमई के लिए प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) देश के रोजगार और निर्यात की रीढ़ हैं। यदि ये उद्योग ऊर्जा-कुशल तकनीक अपनाएँ, सौर या पवन ऊर्जा का उपयोग करें और उत्पादन प्रक्रिया को स्वच्छ बनाएं, तो उन्हें ऊर्जा लागत में कमी और कार्बन क्रेडिट से अतिरिक्त आय—दोहरा लाभ मिल सकता है। वैश्विक बाजार में ‘ग्रीन सप्लाई चेन’ की मांग बढ़ रही है, जिससे भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धा क्षमता सुदृढ़ हो सकती है।
3. राज्यों और सरकार की भूमिका
भारत के विभिन्न राज्यों के पास विविध प्राकृतिक संसाधन हैं—कहीं वन संपदा, कहीं सौर ऊर्जा, तो कहीं पवन ऊर्जा की प्रचुरता। यदि राज्य इन संसाधनों के आधार पर कार्बन परियोजनाएँ विकसित करें, तो राजस्व का नया स्रोत तैयार हो सकता है। केंद्र सरकार के लिए एक पारदर्शी और विश्वसनीय राष्ट्रीय कार्बन बाजार का विकास रणनीतिक आवश्यकता है, जिससे भारत वैश्विक कार्बन फाइनेंस में महत्वपूर्ण स्थान बना सके।
कॉर्पोरेट, निवेश और युवाओं के लिए अवसर
दुनिया भर में ईएसजी (पर्यावरण, सामाजिक उत्तरदायित्व और सुशासन) आधारित निवेश तेजी से बढ़ रहा है। जो कंपनियाँ अपने उत्सर्जन में कमी लाती हैं और कार्बन क्रेडिट उत्पन्न करती हैं, वे निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बन रही हैं। यह केवल छवि सुधार का विषय नहीं, बल्कि दीर्घकालिक व्यावसायिक स्थिरता की रणनीति है।
युवा पीढ़ी के लिए भी यह क्षेत्र नए अवसर लेकर आया है—कार्बन अकाउंटिंग, पर्यावरण ऑडिट, सस्टेनेबिलिटी कंसल्टेंसी, कार्बन मार्केट विश्लेषण और टेक्नोलॉजी आधारित स्टार्टअप आने वाले वर्षों में तेजी से विकसित होंगे।
भारत की प्रतिबद्धता और आगे का मार्ग
Paris Agreement के तहत भारत ने 2030 तक गैर-जीवाश्म स्रोतों से 500 गीगावाट ऊर्जा क्षमता स्थापित करने और उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत कमी का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं; इसके लिए उद्योग, किसान, निवेशक और नागरिक—सभी की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
स्पष्ट है कि कार्बन क्रेडिट केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है। यह भविष्य की अर्थव्यवस्था, व्यापार नीति और राष्ट्रीय रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि भारत इसे पारदर्शिता, संतुलित नीति और दूरदर्शिता के साथ अपनाता है, तो यह बाध्यता नहीं बल्कि विकास का नया अध्याय सिद्ध हो सकता है।
