बाराबंकी की रामलीला में भावुक हुआ भरत मिलाप प्रसंग, प्रभु श्रीराम की चरण पादुकाएं सिर पर लेकर लौटे भरत
बाराबंकी। “प्रभु कर कृपा पावरी दीन्ही, सादर भरत शीश धर लीन्ही” और “रामभक्त ले चला रे राम की निशानी...” जैसे भावपूर्ण प्रसंगों के साथ रामलीला में भरत मिलाप का मंचन किया गया। प्रभु श्रीराम के प्रति भरत के त्याग, प्रेम और समर्पण को देखकर दर्शक भावविभोर हो उठे। पूरी लीला के दौरान वातावरण भक्तिमय बना रहा और श्रद्धालु जय श्रीराम के जयकारे लगाते रहे।
भाई के वनवास की खबर सुनकर व्याकुल हुए भरत
लीला के प्रसंग के अनुसार, प्रभु श्रीराम अपनी पत्नी माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ चित्रकूट पर्वत पर वनवास व्यतीत कर रहे थे। उधर, मामा के घर से अयोध्या लौटे भरत को जब पता चला कि श्रीराम 14 वर्ष के वनवास पर जा चुके हैं, तो वे व्याकुल हो उठे। माता कैकेयी के निर्णय से दुखी भरत ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कुमाता नहीं होती। उन्होंने इस घटनाक्रम के लिए स्वयं को दोषी मानते हुए चिंता जताई कि लोग उन पर राज्य के लालच में अपने बड़े भाई को वनवास दिलाने का आरोप लगाएंगे।
माता कौशल्या और सुमित्रा ने भरत को समझाया कि राजा दशरथ का निधन हो चुका है। पिता के अंतिम संस्कार के बाद भरत मंत्रियों और अयोध्या की प्रजा के साथ प्रभु श्रीराम को वापस लाने के लिए वन की ओर प्रस्थान करते हैं। निषादराज से जानकारी मिलने के बाद वे चित्रकूट पहुंचते हैं।
राम-भरत मिलाप ने जीता श्रद्धालुओं का दिल
चित्रकूट में जब लक्ष्मण ने भरत को बड़ी सेना के साथ आते देखा, तो वे आशंकित हो उठे। लेकिन प्रभु श्रीराम ने उन्हें शांत करते हुए भरत को आने देने की बात कही। इसके बाद जब भरत ने अपने प्रिय बड़े भाई श्रीराम के दर्शन किए, तो वे भावुक होकर उनके चरणों में गिर पड़े और क्षमा याचना करने लगे। श्रीराम ने भी अपने अनुज को गले लगाकर स्नेह दिया।
इसके बाद भरत ने तीनों माताओं के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और श्रीराम को राजा दशरथ के निधन का समाचार सुनाया। यह सुनकर प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण शोकाकुल हो उठे। इस दृश्य ने दर्शकों को भावुक कर दिया।
पिता के वचन की मर्यादा के लिए अडिग रहे श्रीराम
भरत ने बार-बार श्रीराम से अयोध्या लौटने का आग्रह किया। मंत्री सुमंत और अयोध्या से आए अन्य लोगों ने भी उनसे वापस चलने की विनती की। लेकिन श्रीराम ने पिता के वचन की मर्यादा निभाने का संकल्प दोहराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि रघुकुल की परंपरा में प्राण भले चले जाएं, लेकिन वचन नहीं टूटना चाहिए।
श्रीराम ने भरत को समझाया कि अयोध्या की प्रजा की देखभाल करना, राज्य का संचालन करना और माताओं के प्रति अपने दायित्व निभाना उनका कर्तव्य है। इसके बाद भरत ने प्रभु श्रीराम की चरण पादुकाएं अपने सिर पर धारण कीं और अश्रुपूरित आंखों से विदा ली।
मान्यता के अनुसार, भरत ने 14 वर्षों तक श्रीराम की चरण पादुकाओं को अयोध्या के सिंहासन पर स्थापित रखकर उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन किया और स्वयं तपस्वी जैसा जीवन व्यतीत किया। भरत का यह त्याग और भ्रातृप्रेम रामकथा के सबसे प्रेरणादायी प्रसंगों में गिना जाता है।
कलाकारों और आयोजन से जुड़े लोगों की रही सहभागिता
मंचन में भरत की भूमिका आदित्य पाठक, राजा जनक की भूमिका अनुज वर्मा और शत्रुघ्न की भूमिका सिद्धार्थ मिश्रा ने निभाई। कलाकारों ने अपने अभिनय से प्रसंग को जीवंत बनाने का प्रयास किया। इस अवसर पर लीला व्यास प्रमोद पाठक, राम लखन श्रीवास्तव, राजेश मौर्य खन्नू, राजीव पाठक, शिव कुमार वर्मा, राजू पटेल, राजेश गुप्ता कृष्णा, विनय सिंह, गुरदीप सिंह, पुरुषोत्तम टंडन और संजय तिवारी सहित अनेक लोग उपस्थित रहे। भरत मिलाप के मंचन ने श्रद्धालुओं को भाईचारे, त्याग, कर्तव्य और मर्यादा का संदेश दिया। भक्तिमय वातावरण में संपन्न इस लीला ने एक बार फिर रामकथा के आदर्शों को जनमानस के सामने जीवंत कर दिया।
