जलवायु परिवर्तन की बड़ी चेतावनी: 'एल नीनो' से भारत में मानसून हो सकता है कमजोर, कृषि और पेयजल संकट की आशंका – प्रो. भरत राज सिंह

Major Climate Change Warning: 'El Niño' Could Weaken India's Monsoon; Risk of Agricultural and Drinking Water Crises – Prof. Bharat Raj Singh
 
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लखनऊ, 11 जुलाई 2026: वैश्विक जलवायु परिवर्तन (Global Climate Change) के दौर में मौसम का बदलता मिजाज पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इसी संवेदनशील विषय पर द इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया), उत्तर प्रदेश राज्य केंद्र द्वारा लखनऊ के रिवर बैंक कॉलोनी स्थित इंजीनियर्स भवन में एक विशेष तकनीकी व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य विषय “एल नीनो एवं वैश्विक जलवायु (El Niño and Global Climate)” रहा, जिसमें वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने भविष्य के पर्यावरणीय खतरों पर विस्तार से चर्चा की।

केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं है 'एल नीनो' का असर

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज (SMS), लखनऊ के महानिदेशक (तकनीकी) प्रो. (डॉ.) भरत राज सिंह ने अपने व्याख्यान में एल नीनो के वैज्ञानिक और व्यावहारिक पहलुओं को उजागर किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि एल नीनो कोई स्थानीय मौसमी घटना नहीं है, बल्कि यह पूरे वैश्विक मौसम चक्र को प्रभावित करने वाली एक महाविनाशकारी जलवायु शक्ति है। प्रो. सिंह ने कहा:प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय (Equatorial) क्षेत्र में समुद्री सतह के तापमान में होने वाली असामान्य वृद्धि से 'एल नीनो' का जन्म होता है। इसका सीधा और घातक असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon) पर पड़ता है, जिससे मानसूनी हवाएं कमजोर हो जाती हैं।"

भारत में सूखा, खाद्यान्न संकट और बिजली उत्पादन प्रभावित होने का खतरा

प्रो. भरत राज सिंह ने आगाह किया कि यदि एल नीनो के प्रभाव से भारतीय मानसून कमजोर होता है, तो देश को कई मोर्चों पर एक साथ गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है:

  • कृषि और खाद्यान्न: वर्षा में कमी के कारण देश के कई हिस्सों में सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे कृषि उत्पादन और खाद्यान्न की पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है।

  • जल संकट: नदियों, बांधों और जलाशयों में पानी की कमी होगी, जिससे भूजल स्तर (Groundwater Level) तेजी से नीचे गिरेगा। इसके परिणामस्वरूप सिंचाई के साथ-साथ पेयजल का भी गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।

  • आर्थिक प्रभाव: कृषि संकट के कारण खाद्य महंगाई (Food Inflation) बढ़ेगी, जिसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इसके अलावा, जलाशयों में पानी की कमी से जल-विद्युत (Hydroelectricity) उत्पादन भी बाधित होगा।

उन्होंने यह भी बताया कि जहां एक तरफ भारत जैसे देशों में सूखे का खतरा बढ़ता है, वहीं विश्व के अन्य हिस्सों में इसके प्रभाव से अत्यधिक मूसलाधार बारिश, भीषण बाढ़, जंगलों की आग (Wildfires) और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (Marine Ecosystem) में विनाशकारी बदलाव जैसी चरम घटनाएं देखने को मिलती हैं।

आधुनिक तकनीक और जन-जागरूकता ही एकमात्र बचाव

बदलती वैश्विक जलवायु के इस दौर में इन जोखिमों को कम करने के उपायों पर बात करते हुए प्रो. सिंह ने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक मौसम प्रौद्योगिकी, सटीक पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System), प्रभावी सरकारी नीतियां और बड़े पैमाने पर जन-जागरूकता ही इस जलवायु संकट से निपटने के प्रमुख आधार हैं।

इस महत्वपूर्ण तकनीकी सत्र की अध्यक्षता आई.ई.आई. (IEI) उत्तर प्रदेश राज्य केंद्र के अध्यक्ष इं. वी. पी. सिंह ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि इस प्रकार के तकनीकी और वैज्ञानिक कार्यक्रम पर्यावरण संरक्षण तथा सतत विकास (Sustainable Development) के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अत्यंत उपयोगी और समय की मांग हैं।

कार्यक्रम का सफल संचालन प्रो. जमाल नुसरत द्वारा किया गया। व्याख्यान के समापन पर मानद सचिव इं. एन. के. निशाद ने कार्यक्रम में आए सभी सम्मानित अतिथियों, मुख्य वक्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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