Bihar Ratna: लोकगायिका सोनी चौधरी को मिला 'बिहार रत्न सम्मान', सुरों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं मिथिला की सोंधी खुशबू
🎶 लोकगायिका ही नहीं, समाज की संवेदनशील रचनाकार भी हैं सोनी
सोनी चौधरी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनकी पहचान सिर्फ मंचीय चकाचौंध तक सीमित नहीं है। वे एक बहुआयामी साधिका हैं जिन्होंने लोकगीत, भजन, ग़ज़ल, ठुमरी और भावगीत को समान आत्मीयता और गहराई के साथ अपने स्वर दिए हैं।उनकी लेखनी और आवाज में समाज के प्रति एक गहरा सरोकार झलकता है। मनुष्य की कमियां खोजने वाली प्रवृत्ति पर चोट करते हुए जब वे अपनी पंक्तियां पढ़ती हैं:"तकिते रहलहुँ कौआ सभदिन, कान अपन नहि देखलहुँ, ताड़ैत रहलहुँ अवगुण सबहक, टिटही बनि नभ टेकलहुँ..."तो यह लोकभाषा में कही गई बात सीधे सुनने वाले के दिल में उतर जाती है और एक गहरी सामाजिक चेतना का परिचय देती है।
📜 मिथिला की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महिमा का गान
महाकवि विद्यापति की पदावली, विवाह गीत, सोहर, समदाउन, भगैत और देवी-गीतों के जरिए मिथिला की माटी की सोंधी गंध को समेटे हुए सोनी चौधरी ने कई यादगार प्रस्तुतियां दी हैं।
-
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: उनकी प्रसिद्ध रचना "मिथिलेमे गंगा काशी..." उस अटूट लोकविश्वास को दर्शाती है जिसमें मिथिला को ज्ञान और श्रद्धा का केंद्र माना गया है।
-
प्रेम और सौंदर्य का संतुलन: दूरदर्शन बिहार से प्रसारित उनकी बेहद लोकप्रिय रचना "पुष्प की मंजरी"— "तुम भ्रमर मैं बनूं पुष्प की मंजरी, तुम अधर मैं बनूं प्रीत की बाँसुरी..." उनके भीतर की कवयित्री और संवेदनशील संगीतकार दोनों का बेहतरीन परिचय देती है।
-
भक्ति और समर्पण: जब वे "दर्शनक पियासल हमर नयन..." गाती हैं, तो श्रोता भाव-विभोर होकर भक्ति के सागर में डूब जाते हैं।
🏆 पुरस्कारों और अलंकरणों का सफर
दरभंगा के शुभंकरपुर में जन्मी सोनी चौधरी बचपन से ही एक समृद्ध साहित्यिक माहौल में पली-बढ़ी हैं। वे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के सेवानिवृत्त अध्यक्ष डॉ. रमाकांत झा की सुपुत्री हैं और बेनीपुर प्रखंड के नेहरा गाँव के प्रतिष्ठित गौड़ीशंकर चौधरी परिवार की पुत्रवधू हैं।
'बिहार रत्न सम्मान' से पहले भी उन्हें उनकी कला के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है, जिनमें शामिल हैं:
-
संगीत रत्न सम्मान-2022
-
सुर मधुकर सम्मान
-
तिलकामांझी राष्ट्रीय सम्मान
-
स्वामी विवेकानंद युवा सम्मान
-
संत शिरोमणि लक्ष्मीनाथ गोसाई सम्मान
🛡️ बाजारवाद के दौर में लोक-धुनों का संरक्षण
आज के दौर में जब वैश्वीकरण, डिजिटल संस्कृति और बाजारवाद के दबाव में पारंपरिक लोकसंगीत और लोकधुनेँ अपना मूल अस्तित्व खोती जा रही हैं, ऐसे समय में सोनी चौधरी जैसी समर्पित कलाकार एक संवाहक की भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि लोकसंगीत केवल अतीत की कोई धुंधली याद या स्मृति नहीं है, बल्कि यह हमारे वर्तमान की एक जीवंत धड़कन है।
जब भी सोनी चौधरी के कंठ से मैथिली की मिठास गूँजती है, तो ऐसा लगता है कि मानो पूरी मिथिला संस्कृति जीवंत हो उठी हो। उनकी यह संगीत साधना न केवल आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महान प्रेरणा है, बल्कि यह विश्वास भी जगाती है कि जब तक ऐसे स्वर देश में गूंज रहे हैं, तब तक हमारी सांस्कृतिक आत्मा अक्षुण्ण रहेगी।
